आचार्य-शिष्य संबंध के कई स्तर होते हैं। गुरु पक्षपाती नहीं होता और सबको समान रूप से मार्गदर्शन देता है। अगले स्तर पर वह कुछ विशेष शिष्यों को कार्य सौंपकर उनकी आज्ञापालन और अनुशासन की परीक्षा लेता है। जो विपरीत कार्य करता है, उसकी उपेक्षा की जाती है। त्रुटियाँ होना स्वाभाविक है क्योंकि हम पूर्ण नहीं हैं, हम पूर्णता की ओर बढ़ रहे हैं। त्रुटि को स्वीकारने वाला उत्तम शिष्य होता है और दोष पहचानकर तुरंत छोड़ देना भी उसकी विशेषता है। गुरु शिष्य को कार्य बताकर अगले स्तर के लिए तैयार करता है और योग्य शिष्य के सूक्ष्म दोष भी दूर करना चाहता है। प्रिय शिष्य को वह कठोरता से दोष बताता है और कठोर व्यवहार उसकी अधिक कृपा का प्रतीक होता है। गुरु शिष्य के दोषों को भली-भाँति जानता है और उन्हें दूर करने में मदद करता है। दोष बताने पर शिष्य की प्रतिक्रिया ही उसकी परीक्षा होती है। केवल “हाँ जी” कहना पर्याप्त नहीं, आचरण में सुधार जरूरी है। यदि शिष्य क्रोधित होता है तो यह अहंकार का संकेत है, लेकिन दोष सुधारने वाला शिष्य अगले स्तर पर बढ़ता है। गुरु छोटी-सी त्रुटि पर भी डाँटता है। इसका उदाहरण दयानंद और उनके गुरु विरजानंद का प्रसंग है, जहाँ दयानंद जी ने कठोर दंड सहर्ष स्वीकार किया क्योंकि गुरु नहीं चाहते थे कि शिष्य में छोटा सा प्रमाद भी रह जाए। कठोर दंड भी गुरु की कृपा माना जाता है और दोष बताने पर शिष्य को तुरंत स्वीकार करना चाहिए। आगे चलकर शिष्य को कार्यभार और उत्तरदायित्व दिए जाते हैं और जो उन्हें आदर्श रूप से निभाता है, वह गुरु का और प्रिय हो जाता है। श्रेष्ठ शिष्य अंततः विद्या का उत्तराधिकारी बनता है और गुरु की परंपरा को आगे बढ़ाता है। उपनिषदों में आरूणी की समर्पण भावना इसका उदाहरण है, जिसने गुरु की आज्ञा पालन हेतु अपने शरीर से ही मेड़ बाँध दी और अपने तप व समर्पण से ऋषि बना। नचिकेता का धैर्य और श्रद्धा भी इसी का उदाहरण है, जिसने तीन दिन भूखे-प्यासे रहकर भी धैर्य नहीं छोड़ा और जिसकी निष्ठा से यमराज भी प्रभावित हुए। इस प्रकार शिष्य के विकास के कई स्तर होते हैं।