ऋग्वेद को ज्ञान प्रधान माना गया है और यह चारों वेदों में सबसे बड़ा है। इसमें लगभग दस हज़ार मंत्र हैं और यदि एक गायत्री मंत्र या महामृत्युंजय मंत्र की ही व्याख्या इतनी विस्तृत हो सकती है तो सोचिए कि दस हज़ार मंत्रों में कितना ज्ञान छिपा होगा। ऋग्वेद पारायण यज्ञ का लाभ यह है कि लोगों को वेदों का परिचय मिले और वेदों के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो। बहुत लोग यह जानते हैं कि गीता किसने कही, रामायण किसने लिखी, शिवपुराण में शिवजी की कथाएँ हैं, रामचरितमानस तुलसीदास ने लिखी, लेकिन यह नहीं जानते कि वेद किसने लिखे। इसीलिए कहा जाता है कि वेद अपौरुषेय हैं, अर्थात् उन्हें किसी मनुष्य ने नहीं बनाया, वे मनुष्य के उत्पन्न होते ही परमात्मा से सीधे प्राप्त हुए। हिंदू धर्म की सभी परंपराएँ इस पर सहमत हैं, जबकि पश्चिमी मत विकासवाद को मानता है और कहता है कि मनुष्य बंदर से विकसित हुआ। परंतु भारतीय परंपरा में यह माना जाता है कि मनुष्य सीधा परमात्मा द्वारा उत्पन्न किया गया। जैसे पशुओं की जातियाँ अलग-अलग रहती हैं और स्वभाविक रूप से मिश्रण से नई जाति नहीं बनती, वैसे ही मनुष्य की जाति स्वतंत्र रूप से बनी। कुछ कृत्रिम मिश्रण जैसे घोड़े और गधे का मिलन खच्चर उत्पन्न करता है लेकिन उसकी वंश परंपरा नहीं चलती। इसी प्रकार दो अलग नस्लों की गायों को मिलाने पर दोगली जाति बनती है लेकिन आगे चलकर वह भी समाप्त हो जाती है। इसलिए मनुष्य की उत्पत्ति भी अप्राकृतिक मिश्रण से नहीं हुई, बल्कि परमात्मा ने सीधे ही उसे बनाया और उस समय उसे जो पहला ज्ञान प्राप्त हुआ वही वेद कहलाया।
वेदों को इतना पवित्र माना गया कि इन्हें स्वतंत्र रूप से नहीं फैलाया गया बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा में ही दिया गया। गीता में भगवान कृष्ण भी वेदों की महिमा का वर्णन करते हैं और स्वयं को वेदों में विद्यमान बताते हैं। हमारे यहाँ यह भी विश्वास है कि पहले के लोग हमसे अधिक शक्तिशाली, दीर्घायु, बुद्धिमान और तपस्वी थे, जबकि पश्चिम मानता है कि मनुष्य की क्षमता निरंतर बढ़ी है। भारतीय दृष्टिकोण में आज मानव जाति पतनशील हो रही है जबकि प्राचीन काल में ऋषियों के पास शुद्ध और उत्कृष्ट ज्ञान था और वही वेद कहलाता है। वेद चार हैं—ऋग्वेद मुख्यतः ज्ञानप्रधान है, यजुर्वेद कर्मकांड प्रधान है, सामवेद भक्ति प्रधान है और अथर्ववेद समस्याओं के समाधान से संबंधित है। ऋग्वेद में इतना ज्ञान है कि कोई भी विषय उठाओ, उसका उल्लेख किसी न किसी मंत्र में मिल जाएगा। इसी कारण आज भी ऋग्वेद पर गहन शोध हो रहे हैं और इस पर कम से कम एक हज़ार पीएचडी कार्य हो चुके हैं।