वक्ता सबसे पहले पवमानसूम और उसके तीन प्रकारों के गायन का वर्णन करते हैं और बताते हैं कि यह तीन छंदों में किया गया है एक गायत्री छंद, दूसरा छंद और तीसरा जगती छंद हैं। उन्होंने गायत्री छंद की विशेषता समझाई कि यह 24 अक्षरों का होता है और ओम से नहीं बल्कि तत्सवितुर से आरंभ होता है तत्सवितुर वरेण्यम भार्गव देवस्य धीमहि प्रचोदयात में प्रत्येक अक्षर का महत्व है और इस छंद के उच्चारण से प्रार्थना, स्तुति और बुद्धि की प्राप्ति होती है। गायत्री मंत्र का भाव यह है कि हम परमात्मा के तेजस्वी रूप का ध्यान करें और उनसे सद्बुद्धि प्राप्त करने का अनुरोध करें। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रार्थना निरहंकारी और अहंकाररहित होनी चाहिए तभी वह सफल होती है।
इसके बाद वक्ता गुरुकुल की आवश्यकता और उसकी विशेषताओं की चर्चा करते हैं और बताते हैं कि गुरुकुल सनातन संस्कृति का केंद्र है। सनातन का अर्थ है सदैव से विद्या परंपरा का निरंतर प्रवाह जो प्राचीन काल से चली आ रही है। गुरुकुल वह स्थान है जहाँ गुरु और शिष्य दोनों आश्रय पाते हैं और ज्ञान का आदान-प्रदान होता है। प्राचीन काल में यह स्थान स्वार्थरहित और तप-श्रद्धा से संचालित होता था लेकिन वर्तमान में कई गुरुकुल व्यवसायिक बन गए हैं और उनका मुख्य उद्देश्य धनार्जन बन गया है।
वक्ता बताते हैं कि गुरुकुल की पारंपरिक छवि हमारे मस्तिष्क में पवित्र और प्राकृतिक रूप में बैठी है, जैसे एक वृक्ष के नीचे गुरु और शिष्य शिक्षा प्राप्त करते हैं। इस छवि में प्राकृतिक आश्रय, पीपल या बरगद का वृक्ष, गुरु का स्थान और उनके चारों ओर बैठे शिष्य शामिल हैं। इस प्रकार की गुरुकुल परंपरा हमारे मन में श्रद्धा का केंद्र है और हम इसे आदर्श पुरुषों जैसे भगवान राम और कृष्ण के जीवन से भी जोड़ते हैं।
वक्ता आगे बताते हैं कि पुनर्जन्म में गुरुकुल परंपरा से जुड़ने का अनुभव हमें इस परंपरा के प्रति श्रद्धावान बनाता है। पूर्व में पूरे भारतवर्ष में लाखों गुरुकुल थे और प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप से इससे जुड़ा रहता था। वर्तमान में यह परंपरा क्षीण हो गई है लेकिन इसकी महत्ता और श्रद्धा अभी भी हमारे हृदय में जीवित है। इसलिए इस प्राचीन परंपरा को पुनर्स्थापित करने के लिए वैदिक गुरुकुल एक विशेष प्रयास, उद्यम और विचार है, जिसका उद्देश्य प्राचीन गुरुकुल परंपरा को पुनर्जीवित करना और शुद्ध रूप से विद्यार्थियों को विद्या और ज्ञान से संपन्न करना है।