वक्ता सबसे पहले यह बताते हैं कि गुरु और शिष्य के बीच कई प्रकार के मंत्र हैं जो उपनिषद काल से प्रचलित हैं और महाभारत से भी पहले के समय में प्रचलित थे लगभग 67000 साल पहले। इनमें एक प्रसिद्ध मंत्र है जो आज भी भोजन से पहले बोला जाता है और इसमें पाँच प्रतिज्ञाएँ शामिल हैं। ये पाँच प्रतिज्ञाएँ गुरु और शिष्य के परस्पर संबंध को स्थिर और सुचारू बनाती हैं। पहली प्रतिज्ञा है सहनाववतु जिसका अर्थ है हम दोनों एक दूसरे की रक्षा करेंगे अर्थात गुरु शिष्य की सुरक्षा और शिष्य गुरु की सुरक्षा अपने ज्ञान, आचरण और मार्गदर्शन के द्वारा करेंगे। दूसरी प्रतिज्ञा है सहनवभुनक्तु जिसका अर्थ है हम दोनों मिलकर भोजन करेंगे और इसका गहन अर्थ है कि गुरु और शिष्य अपने संसाधन, ज्ञान और संदेह को साझा करेंगे और आदान-प्रदान के माध्यम से ज्ञान का प्रवाह सुचारू होगा। तीसरी प्रतिज्ञा सहवीर्यम करवा वहई है जिसका तात्पर्य है कि गुरु और शिष्य एक दूसरे के उत्साह और प्रेरणा को बढ़ाएंगे गुरु शिष्य को निरंतर प्रेरित करेगा और शिष्य गुरु की सेवा और प्रशंसा के माध्यम से उसे उत्साहित करेगा और इस प्रकार दोनों आपस में अच्छे से जुड़े रहेंगे और विद्या परंपरा को आगे बढ़ाएंगे। चौथी प्रतिज्ञा तेजस्विनावधीतमस्तु है जिसका अर्थ है कि प्राप्त ज्ञान को केवल अपने तक सीमित न रखकर उसे प्रकाशित कर जगत को आलोकित करेंगे और शुद्ध ज्ञान का प्रकाश फैलाएंगे ताकि सुपात्रों तक यह ज्ञान पहुँचे। पाँचवी और अंतिम प्रतिज्ञा माँ विध्विषावह है जिसका अर्थ है कि गुरु और शिष्य के बीच कोई द्वेष या वैमनस्य न उत्पन्न हो यह प्रतिज्ञा यह सुनिश्चित करती है कि अध्ययन और विद्या प्राप्ति के दौरान आपसी प्रेम, सौहार्द और निष्पक्षता बनी रहे।
वक्ता स्पष्ट करते हैं कि यदि आज के शिक्षक और विद्यार्थी इन पाँच प्रतिज्ञाओं को समझें और उन्हें अपने जीवन में अपनाएँ तो भारत विश्व गुरु बन सकता है और यह विश्व गुरुता किसी पर शासन करने के लिए नहीं बल्कि विश्व को एक परिवार मानकर शुद्ध विद्या और ज्ञान की परंपरा स्थापित करने के लिए है। इस प्रकार ये पाँच प्रतिज्ञाएँ गुरु-शिष्य संबंध को सुदृढ़ करने, ज्ञान के आदान-प्रदान को सुनिश्चित करने, उत्साह बढ़ाने, ज्ञान का प्रकाश फैलाने और द्वेष न उत्पन्न होने देने के लिए आवश्यक हैं और वर्तमान समय में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं।