वक्ता सबसे पहले यह बताते हैं कि मानव जीवन का उद्देश्य अक्सर स्पष्ट नहीं होता और लोग जीवन के उद्देश्य की खोज करते समय प्रायः शास्त्रों या दूसरों की कही सुनी बातों का सहारा लेते हैं लेकिन अक्सर इन उद्देश्यों में स्थूल प्रलोभन छिपा होता है जैसे समाज में प्रतिष्ठा, मान, धन आदि प्राप्त करना जबकि अध्यात्मिक दृष्टि से मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति या मोक्ष की प्राप्ति है। संध्या उपासना में समर्पण मंत्र के माध्यम से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चार पुरुषार्थों का उल्लेख होता है किन्तु उच्च संस्कारी व्यक्ति भी इन उद्देश्यों से पूर्ण रूप से जुड़ नहीं पाते क्योंकि वे अपने आत्मा से दूर रहते हैं। अतः उद्देश्य निर्धारित करने से पहले यह जानना आवश्यक है कि हम कौन हैं और स्वयं को जानना ही प्राथमिक उद्देश्य है अर्थात अपने चेतन स्वरूप, जीवात्मा को समझना। इसके बाद बड़े उद्देश्य की दिशा में दो गतियाँ होती हैं एक उर्ध्व गति और दूसरी अधोगति अर्थात आत्मा निरंतर ऊपर की ओर या नीचे की ओर चलती रहती है और बीच में स्थिर नहीं रहती। कोई व्यक्ति कुछ नहीं कर रहा है तब भी उसकी गति ऊपर या नीचे होती है और पुरुषार्थहीनता अधोगति का लक्षण है। उर्ध्व गति का तात्पर्य है निरंतर पुरुषार्थी होना, उद्यमशील होना, क्षमताओं का विकास करना, ज्ञान, विवेक और समझ को बढ़ाना। स्वतंत्रता और मन की स्वायत्तता उसकी उर्ध्व गति का परिचायक है और जिस व्यक्ति ने सांसारिक भोगों को अपना लक्ष्य बना लिया वह अधोगति में है। ब्रह्मचारी का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि ब्रह्मचारी उर्ध्व रेतस होता है, उसकी ऊर्जा निरंतर ऊपर की ओर बढ़ती रहती है, उसके विचार, उत्साह और ऊर्जा सदा श्रेष्ठ कार्यों में संलग्न रहते हैं जबकि भोगवादी व्यक्ति अधोगति में रहता है। प्रत्येक जीवात्मा अपनी गति चुनने की स्वतंत्रता रखता है और अपनी स्थिति से ऊपर या नीचे जा सकता है अतः ब्रह्मचारी सजग रहता है, एक क्षण के लिए भी विश्रांति नहीं पाता। वर्तमान समाज में ब्रह्मचर्य के पालन की स्थिति विडंबनापूर्ण है क्योंकि ऊर्जा सभी के भीतर मौजूद है, भोगवादी या आध्यात्मिक व्यक्ति सभी अपनी गति में प्रयत्नशील रहते हैं लेकिन अक्सर अपनी गति का अंदाजा नहीं रखते। इसलिए उद्देश्य निर्धारित करना और अपनी गति उर्ध्व रखना आवश्यक है ताकि निरंतर ऊपर बढ़ते रहें, आलस्य और प्रमाद से बचें। यदि व्यक्ति एक दिन अपने लक्ष्य की ओर पुरुषार्थ करता है तो उसका दिन सफल होता है जबकि यदि वह सोकर व्यतीत करता है तो उसकी गति नीचे चली जाती है। इसलिए उर्ध्व गति की ओर निरंतर प्रयास, सजगता, जागरूकता और संलग्नता आवश्यक है। ब्रह्मचारी का पालन इसी ऊर्जा और सजगता में निहित है, जिससे उसकी चेतना के सभी आयामों का विकास होता है। अंततः मानव जीवन का मुख्य प्रयोजन अपनी आध्यात्मिक उन्नति, ज्ञान, विवेक और चेतना के विकास के माध्यम से उर्ध्व गति की ओर बढ़ना है ताकि उसका जीवन निष्फल न हो और वह समाज तथा जगत में सकारात्मक योगदान दे सके।