वक्ता बताते हैं कि कुछ अच्छे सूत्रों से भी काम चल सकता है लेकिन कई ग्रंथों का अध्ययन भी आवश्यक है क्योंकि जीवात्मा का विकास बहुआयामी होता है और अनेक विद्याओं के अध्ययन से उसका आनंद बढ़ता है और प्रत्येक विद्या दिव्य है तथा उसके अध्ययन से आत्मा को लाभ होता है। प्रत्येक विषय का पूरा ज्ञान प्राप्त करने से सूक्ष्म बुद्धि विकसित होती है और एक सूत्र को जीवन में धारण करके आगे बढ़ने पर अन्य सूत्र अपने आप समाहित हो जाते हैं और ऋषियों के ग्रंथों और परंपराओं में समाहित अनुभवों के माध्यम से यदि हम अपने अनुभवों का मिलान करें तो हमारा मार्ग सत्य और सुनिश्चित होता है और भ्रम दूर होता है। इसके अलावा ग्रंथों में भिन्न भिन्न प्रकार की विद्या है जो केवल परमात्मा तक पहुँचाने या मोक्ष प्रदान करने तक सीमित नहीं है बल्कि मन को निर्मल करना, चित्त की शुद्धि करना, आत्मा में पूर्व संस्कारों को समाप्त करना और परमात्मा का प्रकाश आत्मा में प्रकट करना इसका उद्देश्य है और यह प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है क्योंकि अनेक संस्कार और विवेक की उच्च स्थिति आवश्यक होती है। जब तक सभी संस्कार समाप्त नहीं होते तब तक साधक यह नहीं मान सकता कि वह अंतिम लक्ष्य पर पहुँच गया है और इसलिए शास्त्रों, उपनिषदों, वेदों और षड्दर्शन का अध्ययन आवश्यक है ताकि जीवन में सरलता और मार्गदर्शन प्राप्त हो और जीवात्मा मोक्ष की ओर निरंतर अग्रसर रहे। इसके साथ ही ग्रंथों में विरोधाभास नहीं होता, वे एक-दूसरे से जुड़ते हैं और जीवन में प्रयोग के साथ उनका अध्ययन करने से तप और सामर्थ्य विकसित होता है और केवल ग्रंथों के तत्वों तक पहुँचकर उनका ज्ञान प्राप्त करना ही पर्याप्त नहीं बल्कि वर्तमान जीवन में उनका अभ्यास और प्रयोग भी आवश्यक है ताकि जीवात्मा की ऊर्जा और क्षमता पूरी तरह विकसित हो सके और मोक्ष की दिशा में निरंतर प्रगति हो।