वक्ता पूछते हैं कि वेद में परमात्मा का स्वरूप कैसा बताया गया है और सामान्य लोग परमात्मा को किस प्रकार देखते हैं, आचार्य जी बताते हैं कि जो चीज़ हम ने स्वयं अनुभव नहीं की होती, उसके बारे में केवल सुनकर ही जान सकते हैं और सबसे प्राचीन स्रोत जो हमें उपलब्ध है, वह वेद है, वेद में परमात्मा को धर्म का प्राण कहा गया है और उसे सहस्त्राक्ष, सहस्त्रपद और सहस्त्रशीर यानी हजारों आँखों, हजारों पैर और हजारों सिर वाला बताया गया है, इसका अर्थ यह है कि वह पूरे सृष्टि में अपने कर्मों के साधनों के माध्यम से कार्यरत है, जैसे भगवान कृष्ण ने भगवद गीता के ग्यारहवें अध्याय में विराट स्वरूप में दिखाया, यह विराट स्वरूप भी उसी परमात्मा का प्राचीन रूप है और सारा संसार उसके ही अंगों और कर्मों के माध्यम से कार्यरत है
आचार्य जी आगे बताते हैं कि वेद में कहा गया है कि जो कुछ भी भूत, वर्तमान और भविष्य में है, वह सब परमात्मा में विद्यमान है और वह प्रत्येक कण और प्रत्येक वस्तु में समाहित है, इसकी अनुभूति करने पर व्यक्ति यह समझ सकता है कि जो कुछ भी उसका लगता है, जैसे उसका खेत या घर, वह सब वास्तव में परमात्मा का है और इसी दृष्टि से अपने जीवन में कर्म करते हुए आनंद प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि जो कुछ भी है, उसका आधार और उसका स्वामी परमात्मा है और प्रत्येक वस्तु उसके कर्म करने के साधन हैं, और उसके माध्यम से ही संसार चलता है
आचार्य जी ने यह भी स्पष्ट किया कि परमात्मा के अनेक नाम हैं, किन्तु वह एक ही है और वह प्रत्येक क्षण हर जगह विद्यमान है, उसे देखने या अनुभव करने के लिए साधक को अपनी आत्मा के माध्यम से अपने हृदय की गुफा में ध्यान लगाना पड़ता है क्योंकि परमात्मा का वास्तविक दर्शन शरीर या इन्द्रियों से नहीं हो सकता, आत्मा ही परमात्मा का दर्शन कर सकती है, और आत्मा शरीर के भीतर स्थित होती है, इस प्रकार परमात्मा का स्वरूप सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त, निराकार, सर्वत्र और प्रत्येक व्यक्ति के भीतर भी विद्यमान है और यही वेद में वर्णित परमात्मा का स्वरूप है, जिसके अनुभव और ज्ञान से व्यक्ति आनंद, शांति और कर्म में स्थिरता प्राप्त करता है।