वक्ता पूछते हैं कि क्या हम भगवान राम जैसे बन सकते हैं और आचार्य जी स्पष्ट करते हैं कि भगवान राम हमारे भीतर भी छिपे हुए हैं, हमें अपने भीतर राम को जागृत करना है और यह जागृति बच्चों में विशेष रूप से प्रेरणा उत्पन्न करती है, क्योंकि प्रत्येक ग्राम, प्रत्येक बालक में राम का प्रतीक विद्यमान है, इसके लिए राम की दिनचर्या का अध्ययन करना आवश्यक है और रामायण पढ़कर उनके जीवन एवं आचार का पालन करना चाहिए, भगवान राम कभी भी सूर्य उदय के बाद नहीं उठे, युद्धकाल में भी उन्होंने समय का पालन किया, वे हमेशा पूर्व संध्या और प्रातःकाल उठकर अपने गुरुओं और धर्म के अनुसार कार्य करते थे, कौशल्या सुप्रजाराम के साथ महाश्री विश्वामित्र के मार्गदर्शन में सुबह जल्दी उठना और प्रातःकाल संध्या करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था, बच्चों में राम की कथा सुनाने से उनके हृदय में राम बनने की प्रेरणा जागृत होती है और उनकी ऊर्जा सक्रिय होती है
आचार्य जी आगे बताते हैं कि भरत ने राम के वनवास के समय यह प्रतिज्ञा की कि अगर उनके मन में कभी भी राम के वनवास के लिए इच्छा उत्पन्न होती तो उन्हें उसी प्रकार पाप लगेगा जैसे सूर्य उदय के बाद उठने वाले को लगते हैं, इससे राम के जीवन में प्रातःकाल उठने, संध्या करने और गुरुओं के आश्रम में समय पर उपस्थित होने का महत्व स्पष्ट होता है, राम जब भी किसी आश्रम में रुकते थे, सुबह जल्दी उठकर साईं काल में ऋषि के आश्रम जाते और वहां वे हवन और धार्मिक क्रियाएं करते, यह हवन साधारण हवन नहीं था बल्कि धर्म, तप और पुरुषार्थ का प्रतीक था, इस प्रकार राम का जीवन, उनकी दिनचर्या और प्रातःकाल का नियम हमें यह सिखाता है कि भगवान राम बनने के लिए अपने भीतर धर्म, अनुशासन, समयनिष्ठा और तप को जागृत करना आवश्यक है और बच्चों में यह शिक्षा विशेष रूप से उत्साह और प्रेरणा पैदा करती है।