हर व्यक्ति अपने विषय में कुछ जानता है कि मैं कौन हूँ और कैसा हूँ, अपने गुणों और अवगुणों की जानकारी भी उसे होती है, फिर भी गुरु की आवश्यकता इसलिए होती है क्योंकि गुरु उसके गुणों की वृद्धि करता है और अवगुणों को दूर करता है। गुरु के बिना व्यक्ति अहंकारी हो जाता है और अपने दोषों को पहचान नहीं पाता, कई बार तो वह अपने दोषों को ही गुण मान लेता है। गुरु अपने अनुभव से बता पाता है कि कौन-सा गुण अपनाना है और कौन-सा दोष छोड़ना है, इसलिए गुरु का सान्निध्य आवश्यक है।
लोग प्रायः अपनी प्रशंसा सुनना पसंद करते हैं और अपने आस-पास चापलूस लोगों को रखते हैं, जिससे उनका अहंकार और पुष्ट होता है। दोष बताने वाले उन्हें बुरे लगते हैं, जबकि वास्तव में दोष बताने वाला ही सुधार करता है। कबीरदास का दोहा “निंदक नियरे राखिए” यही सिखाता है कि निंदा करने वाला बिना साबुन और पानी के ही हमें निर्मल कर देता है। यदि गुरु दोष बताए तो वह निंदक नहीं, सच्चा हितैषी होता है।
अच्छा गुरु सभी कमियाँ एक साथ नहीं बताता बल्कि धीरे-धीरे सुधार कराता है ताकि साधक निराश न हो। अंतःकरण का शोधन बहुत कठिन कार्य है क्योंकि जन्म-जन्मांतरों के संस्कार उसमें भरे रहते हैं, जिन्हें धीरे-धीरे बाहर निकालना पड़ता है। इसलिए गुरु के प्रति समर्पण जरूरी है क्योंकि श्रद्धा से ही साधना में प्रगति संभव है।
गुरु मार्गदर्शन करता है, परंतु सुधार स्वयं साधक को करना होता है। हर दिन आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि पिछले चौबीस घंटे में मैंने क्या प्रगति की, क्या नया सीखा, केवल समय बिताया या वास्तव में आगे बढ़ा। शरीर तो प्रतिदिन वृद्ध होता है, परंतु यदि मन और संस्कारों में सुधार न हुआ तो वह दोष है। ब्रह्मचर्य अवस्था में प्रतिदिन नया सीखना और कर्तव्यों का पालन करना आवश्यक है, तभी उन्नति होती है।