यह पूरा वक्तव्य गुरुकुल की स्थापना, उसके उद्देश्य और भावी योजना का एक गहन चिंतन है जिसमें लेखक यह सिद्धांत प्रस्तुत करता है कि शिक्षा का मूल स्वरूप शुल्क या व्यापार नहीं बल्कि ब्राह्मण वृत्ति अर्थात ज्ञान की वृद्धि और दान की परंपरा है। वह कहता है कि गुरुकुल निशुल्क होना चाहिए, विद्यार्थी चाहे तो अपनी सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा दे सकते हैं, परंतु शिक्षा किसी भी मूल्य पर बिकाऊ वस्तु नहीं होनी चाहिए। इस संस्थान का संकल्प है कि यहाँ पर न कोई व्यावसायिक गतिविधि होगी और न सांसारिक विषय पढ़ाए जाएंगे, यहाँ केवल विशुद्ध रूप से अर्ष ज्ञान का अध्ययन और अध्यापन होगा। लेखक स्पष्ट करता है कि आज इस प्रकार के शुद्ध संस्थान लगभग लुप्त हो चुके हैं, इसलिए इस गुरुकुल का महत्व और भी अधिक है।
गुरुकुल का प्रथम लक्ष्य है वेदाध्ययन और वेदों को सुलभ कराना क्योंकि धर्म का मूल वेद ही हैं और आज बहुत कम लोग वेदों को वास्तव में पढ़ते हैं। गुरुकुल का उद्देश्य प्रचार करना नहीं बल्कि वेदों का अध्ययन करना और कराना है ताकि सनातन धर्म की नींव दृढ़ हो सके। इसके साथ ही अर्ष ग्रंथों का अध्ययन भी होगा जिनमें ऋषियों ने वेदों की व्याख्या और विविध विद्याओं का विस्तार किया था। इन ग्रंथों को पारंपरिक रूप से ही नहीं बल्कि आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पद्धतियों के साथ पढ़ाया जाएगा ताकि ज्ञान की परंपरा केवल संरक्षित ही न रहे बल्कि जीवंत और प्रासंगिक भी बने। लेखक कहता है कि यह गुरुकुल उसका निजी प्रयास नहीं है, बल्कि यह उन सबका है जो वैदिक परंपरा से जुड़े हुए हैं और इसकी उन्नति में रुचि रखते हैं।
गुरुकुल का दूसरा मुख्य कार्य है परमात्मा के शुद्ध स्वरूप की उपासना और अनुभूति। लेखक यह मानता है कि परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को जाने बिना सारे कर्मकांड और धार्मिक गतिविधियाँ खोखली हो जाती हैं। इसलिए योगाभ्यास और साधना गुरुकुल की शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग होंगे ताकि विद्यार्थी केवल सिद्धांत ही न जानें बल्कि परमात्मा के अनुभव की ओर भी अग्रसर हों।
तीसरा कार्य है शोध और अनुसंधान। लेखक बताता है कि गुरुकुल में शोध कार्य के लिए पुस्तकालय और विद्वान तैयार किए जाएंगे, शोध प्रकाशन होंगे और नई परंपरा का निर्माण होगा क्योंकि पिछले दशकों में वैदिक शोध का क्षेत्र बहुत संकुचित हो गया है। इस शोध का उद्देश्य वेद और अर्ष ग्रंथों को आधुनिक संदर्भ में पुनः प्रस्तुत करना और उन्हें भावी पीढ़ियों के लिए सुलभ बनाना है।
वक्ता अंत में कहता है कि यह गुरुकुल किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरे समाज और परिवार का है, इसे आगे बढ़ाने के लिए सबके सहयोग, मार्गदर्शन और आशीर्वाद की आवश्यकता है। इस प्रकार यह वक्तव्य गुरुकुल को एक जीवंत वैदिक विश्वविद्यालय के रूप में प्रस्तुत करता है जो शिक्षा को दान मानता है, वेद और अर्ष ग्रंथों का अध्ययन कराता है, योग और साधना द्वारा परमात्मा का अनुभव कराता है और शोध द्वारा ज्ञान परंपरा को नई ऊर्जा और नई दिशा प्रदान करता है।