VedicGurukul

लेखक यहाँ यह स्पष्ट करना चाहता है कि आज के समय में वास्तविक अर्ष भक्ति लुप्त होती जा रही है। अर्ष भक्ति का आशय यह है कि हमारी बुद्धि और शिक्षा का आधार केवल ऋषियों द्वारा रचित ग्रंथ ही हों, न कि इधर-उधर के दिखावे वाले या आडंबरपूर्ण विचार। स्वामी दयानंद जी ने स्वयं हजारों ग्रंथ पढ़े, किंतु अंत में यह सिद्धांत दिया कि केवल अर्ष ग्रंथों पर टिकना चाहिए क्योंकि अन्य सभी ग्रंथों में जो भी ज्ञान है, वह मूलतः अर्ष से ही लिया गया है। वेदों में पूर्ण ज्ञान है, उसमें किसी भी प्रकार की कमी नहीं है और अर्ष ग्रंथ उसी ज्ञान को विषयवार सूत्रबद्ध करके प्रस्तुत करते हैं।

लेखक योग का उदाहरण देते हुए बताता है कि आज योग के क्षेत्र में भी मूल पतंजलि के सूत्रों को छोड़कर लोग बाहरी आकर्षण, आडंबर और दिखावे पर ज़ोर दे रहे हैं। लोकलुभावन प्रयोग, विज्ञापन और बाजारू प्रस्तुतियों के कारण साधक मूल योग की ओर नहीं बढ़ पाता और ऋषि ग्रंथों तक पहुँचने से विमुख हो जाता है। इसी प्रकार अन्य दर्शन और परिषदों में भी यही स्थिति हो गई है, जबकि ऋषियों ने विषय को प्रारंभ से अंत तक व्यवस्थित रूप से सूत्रों में ग्रंथित किया था।

समस्या यह है कि ऋषि ग्रंथों की व्याख्या को अनावश्यक रूप से कठिन और जटिल बना दिया गया है, जिससे उनका प्रकाश समाज में पूर्ण रूप से नहीं हो पा रहा। आवश्यक है कि इन ग्रंथों की सरल और स्पष्ट व्याख्या की जाए ताकि जनसामान्य तक उनका वास्तविक ज्ञान पहुँच सके। यही गुरुकुल का लक्ष्य भी होना चाहिए कि वह केवल अर्ष ग्रंथों का अध्ययन और अध्यापन करे, न कि आधुनिक नवजात या आडंबरपूर्ण ग्रंथों में उलझे।

लेखक यह भी इंगित करता है कि जैसे आधुनिक विज्ञान में भौतिकी, रसायन, जीवविज्ञान आदि विषय अलग-अलग होते हुए भी परस्पर विरोधी नहीं हैं, उसी प्रकार वेदांत, न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग जैसे दर्शनों में भी विरोधाभास नहीं होना चाहिए। यदि सभी का आधार सत्य है तो उनमें भिन्न संप्रदाय या विभाजन की गुंजाइश ही नहीं रहती। किंतु आज हो यह रहा है कि लोग किसी एक अंश को पकड़कर उसकी मार्केटिंग करने लग जाते हैं और इससे मूल तत्त्व पीछे छूट जाता है।

अंत में लेखक यह दृढ़ घोषणा करता है कि अर्ष ग्रंथ ही हमारे मार्गदर्शक हों, उनका ही अध्ययन और अध्यापन हो, उन्हीं की भक्ति की जाए। यही सच्चा मार्ग है और यही उद्देश्य गुरुकुल का होना चाहिए कि अर्ष ग्रंथों को सरल व्याख्या के साथ प्रकट कर संसार के सामने रखा जाए। जब यह होगा तभी ऋषियों के ज्ञान का प्रयोजन पूरा होगा और समाज आडंबरों से मुक्त होकर सत्य मार्ग पर आगे बढ़ सकेगा।