VedicGurukul

लेखक यहाँ यह बताना चाहता है कि प्राचीन ऋषियों ने अपने सूत्रों के माध्यम से ब्रह्मांड और पदार्थों के स्वरूप पर जिस प्रकार का चिंतन किया, वह केवल उस समय के लिए ही नहीं बल्कि आज की आधुनिक विज्ञान की खोजों से भी कहीं अधिक गहरा और व्यापक था। जब कोई बड़ी सभ्यता नष्ट हो जाती है तो उसके केवल खंडहर ही शेष रह जाते हैं, किंतु हमारे ऋषियों ने सूत्रों में ऐसा विज्ञान छिपा दिया कि उन पर बार-बार विचार करने से नए-नए रहस्य और ज्ञान के आयाम खुलते चले जाते हैं। वैशेषिक दर्शन में द्रव्यों का जो विभाजन बताया गया, उसकी तुलना आधुनिक विज्ञान की पीरियॉडिक टेबल और कण भौतिकी से की जा सकती है। ऋषियों ने पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु को मूलभूत परमाणु कहा, लेकिन उनका परमाणु इलेक्ट्रॉन-प्रोटॉन-न्यूट्रॉन वाला एटम नहीं था, बल्कि प्राथमिक कण था। अग्नि के परमाणु को उन्होंने प्रकाश और ऊर्जा से जोड़ा, पृथ्वी, जल और वायु के कणों को ऑर्बिटल्स की तरह समझाया और इस आधार पर वैदिक एटॉमिक मॉडल की कल्पना प्रस्तुत की।

इसके साथ ही उन्होंने आकाश को भी एक द्रव्य माना जिसे आज हम ईथर, स्पेस या टाइम-डाइमेंशन के रूप में जानते हैं। ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले ही दिक अर्थात दिशा को द्रव्य माना और दस दिशाओं की चर्चा की, जो आज की स्ट्रिंग थ्योरी के दस या ग्यारह आयामों की अवधारणा से मेल खाती है। इस तुलना से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन चिंतन केवल आध्यात्मिक नहीं था बल्कि वैज्ञानिक गहराई से परिपूर्ण था।

आगे लेखक आत्मा और मन को भी द्रव्य मानने की व्याख्या करता है। आत्मा को चेतना या कॉन्शसनेस कहा गया, जो भौतिक विज्ञान और जीव विज्ञान दोनों के अध्ययन से संबंधित हो सकती है। मन को आत्मा और प्रकृति के बीच की सूक्ष्म कड़ी बताया गया जिसमें बुद्धि और विचार की प्रक्रिया चलती है। इसे आधुनिक दृष्टि से देखें तो यह क्लाउड कंप्यूटिंग, डेटा स्टोरेज और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी अवधारणाओं से मेल खाता है। इस प्रकार ऋषियों ने मन को भी पदार्थ के रूप में स्वीकार कर उसका विश्लेषण किया।

लेखक का उद्देश्य यह दिखाना है कि एक ही सूत्र के भीतर इतना गहरा और विस्तृत ज्ञान छिपा है कि यदि विद्यार्थी के मन में प्रारंभ से ही इस प्रकार की स्थिर नींव रखी जाए तो उसका चिंतन और बौद्धिक विकास असाधारण स्तर तक पहुँच सकता है। इस प्रकार प्राचीन सूत्र केवल दर्शन या धर्म के नहीं थे, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड, चेतना और विज्ञान के रहस्यों को खोलने वाली गूढ़ कुंजियाँ थे, जिन पर बार-बार चिंतन करने से आज भी नए शोध और नई संभावनाओं के द्वार खुल सकते हैं।