यह पूरा वर्णन हमें यह समझाता है कि भारत की परंपराएँ कितनी गहरी और वैज्ञानिक रही हैं और समय के साथ उनमें कितना परिवर्तन आया है। लेखक ने पहले उदाहरणों से स्पष्ट किया कि जैसे सरदार पटेल की प्रतिमा में हर गाँव से लोहा मंगवाकर उसे सामूहिक योगदान का प्रतीक बनाया गया, वैसे ही राम मंदिर निर्माण में भी लोगों ने अपनी-अपनी ओर से ईंटें या सामग्री देकर उसे अपने हिस्से का हिस्सा बनाया। इसी क्रम में प्राचीन काल के अश्वमेध यज्ञ का स्मरण आता है, जहाँ घोड़ा जिस-जिस क्षेत्र में घूम जाता, वहाँ के लोग अपनी सामग्री डालकर उस यज्ञ में सम्मिलित होते थे।
लेखक बताता है कि ऋषि दयानंद ने हमें 16 संस्कारों के यज्ञ की परंपरा तो स्मरण कराई, किंतु प्राचीन भारत में अनेक प्रकार के यज्ञ होते थे जिनकी विस्तृत परंपरा अब भुला दी गई है। समय के साथ एक विचित्र परिवर्तन यह भी हुआ कि हवन सामग्री खरीदने-बेचने की वस्तु बन गई, जबकि वेदकाल में यजमान स्वयं सामग्री तैयार करता था, उसे उगाता था, चुनता था और सार्वजनिक हित के लिए उसका उपयोग करता था। राजा भी लोककल्याण के लिए औषधियों और पुष्टिकारक द्रव्यों का संग्रह करता था।
यज्ञ में कौन-सी वस्तुएँ डाली जाएँ, इसका भी सुव्यवस्थित वर्गीकरण था – अन्न, औषधियाँ, सुगंधित पदार्थ और पुष्टिकारक द्रव्य। इनका अनुपात भी भोजन की तरह संतुलित होता था, जैसे अन्न के साथ थोड़े से मिष्ठान, औषधियाँ और सुगंध मिलकर यज्ञ को पूर्ण करते थे। सामग्री का स्वरूप भी सूक्ष्मता से निर्धारित था – जैसे कच्ची नहीं बल्कि सूखी और पकी हुई लकड़ियाँ ही उपयुक्त थीं, ताकि धुआँ न फैले और सुगंध दूर तक जाए।
लेखक ने विस्तार से यह भी बताया कि यज्ञ की व्यवस्था कितनी बड़ी और जटिल होती थी – कभी-कभी लाखों आहुतियों तक का विधान होता और सामग्री बैलगाड़ियों में भरकर लाई जाती। बड़े यज्ञों में ऋत्विक और पुरोहित पूरे आयोजन की देखरेख करते थे ताकि यजमान निश्चिंत होकर श्रद्धा और आनंद के साथ आहुति दे सके। प्राचीन यज्ञशालाओं के नाम भी विशेष होते थे जैसे नारायणी और देवयजनी, जिनका तात्पर्य यह था कि वहाँ देवताओं का आह्वान और पूजा होती है।
आगे लेखक ने यह भी स्पष्ट किया कि आहुति केवल प्रतीकात्मक क्रिया नहीं है बल्कि उसका सूक्ष्म प्रभाव देवताओं और उन लोकों तक पहुँचता है जहाँ सूक्ष्म शरीर वाले जीव रहते हैं। जैसे पशु-पक्षी या कीट-पतंगे अपनी दृष्टि और अनुभव के अनुसार संसार को अलग-अलग ढंग से देखते हैं, वैसे ही देव लोक के सूक्ष्म प्राणी वेद मंत्रों, सुगंध और हृदय की पवित्रता से जुड़ते हैं और आहुतियों को ग्रहण करते हैं।
अंततः लेखक का संदेश यह है कि यजुर्वेद के स्वाध्याय से हम यह समझें कि इसमें पंचमहायज्ञों, पितृयज्ञों, 16 संस्कारों, सोमयज्ञ, अश्वमेध और बड़े-बड़े राजसूय यज्ञों के मंत्र छिपे हुए हैं। इनका प्रयोग और विनियोग समय के साथ लुप्त हो गया, परंतु यदि हम वेदों का गहन अध्ययन और अभ्यास करें तो इन विधानों को पुनः प्राप्त कर सकते हैं और उसी सूक्ष्मता, संतुलन और वैज्ञानिक दृष्टि से यज्ञों को सम्पन्न कर सकते हैं जैसा प्राचीन काल में होता था।