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यह पूरा प्रसंग ब्रह्मानंद वल्ली के आठवें अनुवाक की व्याख्या है जिसमें ऋषियों ने मनुष्य के आनंद की गहराई और उसकी सीमाओं को स्पष्ट किया है। सामान्यतया हम आनंद को इंद्रियों की संतुष्टि या मनोविकारों की पूर्ति तक ही सीमित मान लेते हैं, किंतु ऋषियों ने इसका सूक्ष्म और गहन विवेचन किया। उन्होंने कहा कि वास्तविक मनुष्य आनंद तब पूर्ण होता है जब व्यक्ति युवा हो, साधु हो, अध्यापक हो, आशिष्ट हो, दृढ़िष्ट हो और बलिष्ठ हो, अर्थात उसमें शारीरिक सामर्थ्य, मानसिक स्थिरता, नैतिक पवित्रता और अभिव्यक्ति की क्षमता सब विद्यमान हों और साथ ही उसके पास धरती के सभी संसाधन उपलब्ध हों। तभी वह मनुष्य आनंद की एक संपूर्ण इकाई प्राप्त कर सकता है जिसे उपनिषद में “एक मनुष्य आनंद” कहा गया है।

इसके आगे ऋषियों ने स्पष्ट किया कि यह मनुष्य आनंद भी अंतिम नहीं है, यदि कोई ज्ञानी यह जान ले कि यह आनंद नश्वर है और उसकी कामना छोड़ दे तो वह अगले स्तर पर पहुँच जाता है जिसे मनुष्य गंधर्व आनंद कहा गया है। यह आनंद मनुष्य आनंद से सौ गुना अधिक है क्योंकि उसमें मनुष्य के भीतर विशेष सामर्थ्य उत्पन्न हो जाती है, उसका चित्त द्वंद्वों से विचलित नहीं होता और वह अधिक प्रसन्नचित्त रहता है। इसके पश्चात देवगंधर्व आनंद, पितृलोक आनंद, अजाना देव आनंद, कर्मदेव आनंद, देव आनंद, इंद्र आनंद, बृहस्पति आनंद, प्रजापति आनंद और अंत में ब्रह्मा आनंद तक की सीढ़ियाँ हैं, प्रत्येक आनंद अपने पूर्ववर्ती आनंद से सौ गुना अधिक बताया गया है।

इस समस्त गणना और वर्गीकरण का उद्देश्य केवल यह दिखाना है कि मनुष्य के सामान्य आनंद की तुलना में परमात्मा का आनंद कितना अनंत और अपरिमेय है। ऋषि कहते हैं कि सभी लोकों और सभी कोषों—अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय—को पार करते हुए आत्मा जब परम पुरुष तक पहुँचती है तभी उसे वास्तविक आनंद की प्राप्ति होती है। यही वह ब्रह्मानंद है जो सबका आधार है, वही आनंद सभी प्राणियों में अंश रूप में प्रकट होता है और वही समुद्र है जिसके सामने मनुष्य का आनंद केवल एक बूँद है।

अतः ऋषि यह प्रेरणा देते हैं कि सांसारिक आनंद को ही अंतिम न मानकर विवेकपूर्वक उसका मूल्यांकन किया जाए, उसकी क्षणभंगुरता को समझा जाए और उस परम आनंद की ओर अग्रसर हुआ जाए जहाँ कोई द्वंद्व नहीं है, जहाँ शांति और पूर्णता है। यही आनंद परमात्मा का आनंद है, वही मोद और प्रमोद है और वही सभी साधकों की अंतिम साधना का लक्ष्य है।