मनुष्य के जीवन में जो निरंतर भागदौड़ है उसका मूल कारण यही है कि उसने सुख को ठीक से समझा नहीं और साधन को ही साध्य मान लिया। मन में यह ख्याल चलता रहता है कि कुछ पाना है, कहीं पहुँचना है, किसी से जुड़ना है या कुछ धन कमा लेना है। जब तक वह नहीं मिलता, मनुष्य बेचैन रहता है और जब मिल जाता है तो थोड़ी देर के लिए तृप्ति होती है, पर उसके बाद भीतर से एक खालीपन उभर आता है। यह खालीपन इसलिए है क्योंकि लक्ष्य ही गलत निर्धारित किया गया था। वस्तुतः भौतिक वस्तुओं और साधनों में पूर्णता होती ही नहीं, इसलिए उनसे मिलने वाला सुख क्षणिक होता है।
शास्त्रकारों ने स्पष्ट किया है कि साधन और साध्य दोनों अलग-अलग हैं। साधन वह माध्यम है जिसके द्वारा हम साध्य तक पहुँचते हैं, और साध्य वह है जो वास्तव में हमारा लक्ष्य है। मनुष्य ने भ्रमवश साधन को ही लक्ष्य मान लिया, इसीलिए संतोष कहीं नहीं मिल रहा। हर व्यक्ति का स्वाभाविक पुरुषार्थ सुख की प्राप्ति है, किंतु विवेक के अभाव में सुख की सही पहचान नहीं हो पाती। फलस्वरूप व्यक्ति सुख के साधनों को ही सुख समझ लेता है और दुख के कारणों को ही दुख मान लेता है। इसी भ्रांति से उसकी यात्रा मृगमरीचिका जैसी हो जाती है – वह जिस सुख की ओर भागता है, वह वहाँ होता ही नहीं।
मनुष्य के पुरुषार्थ को यदि देखें तो चार दिशाओं में उसका जीवन चलता है – सुख की खोज, सुख के साधनों की प्राप्ति, दुख से बचाव और दुख के कारणों से मुक्ति। परंतु भ्रम यही है कि सुख को सीधे नहीं खोजा गया, बल्कि उसके साधनों को ही सुख मान लिया गया। जैसे कोई सोचता है कि ठंडा पानी पीने से सुख मिलेगा, तो वह पानी के स्थान पर फ्रिज को ही सुख समझ लेता है। इसी तरह गरीबी को दुख का कारण मानकर केवल धन संग्रह में लग जाता है। फलस्वरूप न सुख मिलता है, न दुख से मुक्ति।
वास्तविकता यह है कि सुख के स्तर अनेक हैं। इंद्रियों के सुख सीमित और क्षणिक हैं – जैसे रसना की तृप्ति भोजन से हो सकती है, पर वह केवल जीभ पर कुछ क्षण का अनुभव है। भोजन का वास्तविक कार्य शरीर को पोषण देना है, किंतु हमने स्वाद को ही लक्ष्य बना लिया, परिणामस्वरूप हानि ही होती है। मन की इच्छाओं की पूर्ति भी अस्थायी है, क्योंकि मन चंचल है और उसकी चाहतें बदलती रहती हैं। आत्मा का सुख भिन्न प्रकार का है – वह ज्ञान, विवेक, परोपकार, निष्काम कर्म और विद्या से तृप्त होती है। आत्मा की खुराक भौतिक नहीं है, वह शांति, संतोष और पवित्रता से पुष्ट होती है।
यही कारण है कि प्राचीन काल में राजा लोग अपने उत्तराधिकारियों को राज्य सौंपकर तप और अध्यात्म की ओर चले जाते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि जड़ पदार्थ में सुख नहीं है। आज का मनुष्य उसी भौतिक संसाधनों से चिपका पड़ा है और यहीं से सुख खोज रहा है, जबकि वहाँ सुख है ही नहीं। वस्तुतः दुख का कारण अज्ञान है और सुख का आधार आत्मज्ञान। जब तक यह विवेक नहीं आता, तब तक जीवन की भागदौड़ रुकेगी नहीं और मनुष्य बार-बार मृगमरीचिका की तरह धोखा खाता रहेगा।
असल संदेश यही है कि साधन का मूल्य केवल साध्य तक पहुँचने के लिए है, उसे साध्य मान लेना भूल है। भौतिक सुख का अनुभव क्षणिक है, किंतु आत्मा का सुख स्थायी है। जो विवेकपूर्वक इस भेद को पहचान लेता है, वही जीवन में वास्तविक शांति और संतोष प्राप्त कर सकता है।