VedicGurukul

विभिन्न प्रकार के ग्रन्थ और अध्ययन-विषय इस काल में विदित और विकसित हुए तथा साहित्य के विविध रूपों में प्रकट हुए। जैसा कि पूर्वोक्त है, अध्ययन का तकनीकी नाम वैदिक-अध्ययन अर्थात् स्वाध्याय है, जिसकी महिमा का वर्णन शतपथ ब्राह्मण और तैत्तिरीय आरण्यक में अत्यन्त सुन्दर रूप से किया गया है। अन्यत्र विद्वानों के आनन्द का उल्लेख भी मिलता है। शतपथ ब्राह्मण में अश्वमेध यज्ञ के प्रसंग में राजन्य वीणा-वादक एवं गायक का उल्लेख प्राप्त होता है, सम्भवतः वही क्षत्रिय भाटों की परम्परा का अग्रदूत था जिससे महाकाव्य परम्परा का उद्भव हुआ। इस विषय का प्रस्तुतीकरण 1908 के जर्नल ऑफ द रॉयल एशियाटिक सोसायटी तथा वैदिक इंडेक्स पर आधारित है।

श्रोत्रिय अथवा छात्र को सर्वोच्च सम्भव आनन्द तथा समत्व का अधिकारी माना गया है। अध्ययन का उद्देश्य त्रयी-विद्या था, अर्थात् ऋक, यजुस और साम का ज्ञान। तीनों वेदों का अध्ययन करनेवाले को त्रि-शुक्रिय अथवा त्रि-शुक्र कहा गया है, जिसका अर्थ है ‘तीन बार पवित्र’। इन तीनों वेदों के अतिरिक्त इस युग में अनेक अन्य अध्ययन-विषयों का भी विकास हुआ। अनुशासन के अंतर्गत छः वेदांग — शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष — सम्मिलित थे। सायण के अनुसार विद्या में न्याय और मीमांसा जैसे दार्शनिक तंत्र सम्मिलित थे, जबकि एगेलिंग के अनुसार विद्या शब्द सर्पविद्या, विषविद्या जैसे विशिष्ट विज्ञानों व आरम्भिक ब्राह्मण-ग्रन्थों का बोध भी कराता है।

वाक–वाक्यम धार्मिक संवाद या ब्रह्मोद्य जैसे आध्यात्मिक चर्चाओं का नाम है। गेण्डनर के अनुसार यह इतिहास–पुराण का अनिवार्य संवादात्मक स्वरूप है। छान्दोग्य में शंकराचार्य ने इसका अर्थ तर्कशास्त्र किया है। इतिहास और पुराण का प्रथम उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है। शतपथ, जैमिनीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्य उपनिषदों में इतिहास का उल्लेख मिलता है और छान्दोग्य इसे पुराण के साथ मिलाकर पाँचवाँ वेद कहता है। सायण तथा शंकर के अनुसार पुराण में सृष्टि-उत्पत्ति से संबंधित मिथक और कथाएँ सम्मिलित हैं, जबकि इतिहास में प्राचीन नायकों के वृत्तांत और चरित मिलते हैं।

न-पुरुष-वृत्तांत में पुरूरवा और उर्वशी की कथा जैसी प्राचीन नायकों व नायिकाओं से संबंधित कथाएँ आती हैं। यास्क केवल इतिहास को जानता है और ऐतिहासिकों के अनुसार ऋग्वेद में उपाख्यान दृष्टव्य हैं जहाँ अन्य लोग मिथक देखते हैं। ये दोनों विषय पतञ्जलि के काल में परिचित थे। आख्यान का वर्णन ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है, जहाँ सौनःशेप आख्यान राजसूय में कहा गया है तथा शतपथ में सूपर्ण की कथा व्याख्यान नाम से मिलती है। अश्वमेध यज्ञ में वर्ष भर के विचरणकाल में प्रयुक्त कथाएँ परिप्लव कहलाती हैं। अन्वाख्यान उत्तर-कथा अथवा पूरक कथा है जो शतपथ में संदर्भ मात्र के रूप में आती है और कभी इतिहास से पृथक मानी गई है। अनुव्याख्यान मन्त्रों की टीका-रूप ग्रन्थ-प्रकार है जिसका उल्लेख बृहदारण्यक में है। व्याख्यान कहीं अर्थवादात्मक टिप्पणी और कहीं कथा-वृत्तांत के रूप में मिलता है।

गाथा ऋग्वैदिक पद है और गीत या छन्द का अर्थ देती है। ऐतरेय आरण्यक गाथा को ऋक आदि के साथ पद-छन्द रूप में मानता है तथा ऐतरेय ब्राह्मण ऋक को दैवी और गाथा को मानवी कहता है। नाराशंसी मनुष्यों का उत्सव-वर्णन है और कभी गाथा से पृथक मानी गई है। ब्राह्मण धार्मिक अर्थ-व्याख्या वाले ग्रन्थ हैं। क्षत्रविद्या शस्त्रविद्या थी। राशि गणित का रूप थी। नक्षत्र-विद्या ज्योतिष थी। भूतविद्या रोग-प्रभाव तथा तन्त्र-उपचार से संबंधित थी। सर्पविद्या विष और उपचार का विकसित विज्ञान था और कभी गरुड़-विद्या कहलाया। अथर्वाङ्गिरस अथर्ववेद का प्राचीन नाम था जिसमें अभिचार और औषध-क्रियाएँ सम्मिलित थीं। दैव अपशकुन-ज्ञान से संबंधित था। निधि गुप्त धन और स्थान-ज्ञान था। पितृ श्राद्ध-विधि ज्ञान था। सूत्र संक्षिप्त नियम-ग्रन्थ थे। उपनिषद तत्त्व-ज्ञान की गूढ़ शिक्षा के ग्रन्थ थे। श्लोक ब्राह्मणों में सुरक्षित मन्त्र-वृत्त था। वेदानां वेद प्राचीन संस्कृत-व्याकरण था। एकायन नीति और आचरण का ज्ञान था। देव-विद्या देवोपासना और निरुक्त से सम्बद्ध थी। ब्रह्म-विद्या वेदांगों का ज्ञान था। देवजन-विद्या गन्धर्वों की कलाएँ — नृत्य, गीत, वाद्य आदि — तथा कभी आयुर्वेद का अंतर्भाव भी रखती थी।

इन विविध विद्याओं और कलाओं के अतिरिक्त उपनिषद परा-विद्या अर्थात् सर्वोच्च ज्ञान का निर्देश करते हैं जो अपरा-विद्या से पृथक मानी जाती है।

हिन्दी-हिन्दी शब्दकोश (चयनित कठिन शब्द)

शब्दहिन्दी में अर्थ
उपाख्यानकथा, प्रसंग, वृत्तांत
मिथककाल्पनिक या प्रतीकात्मक दन्तकथा
परिप्लवचक्रिक अथवा बार-बार आवर्ती आख्यान
पूरकअतिरिक्त, सहायक या जोड़नेवाला भाग
अर्थवादप्रशंसा या निन्दा के द्वारा शिक्षित करने वाला कथन
दैवीदेव-स्वरूप; दिव्य गुण वाला
मानवीमानव-सम्बंधी
उत्सव-वर्णनउत्सव, दान या यश का वर्णन
अभिचारहानि पहुँचाने वाला कर्म या तन्त्र-प्रयोग
उत्पातअनिष्ट संकेत, अपशकुन
निधि-दर्शनछिपे धन अथवा खजाने की खोज का ज्ञान
श्राद्ध-कर्मपितरों हेतु विधिपूर्वक किया गया अनुष्ठान
संहितजुड़ा हुआ ग्रन्थ या संग्रह
तत्त्व-ज्ञानब्रह्म या परम सत्य का बोध
नीति-सूत्रआचरण और धर्म का निर्देश
इन्द्रजालमायावी तन्त्र, छल-कला

वैदिक एवं दार्शनिक शब्दावली — हिंदी शब्दकोश रूप में

स्वाध्याय — स्वयं के प्रयास से, गुरु के मार्गदर्शन में वेदों तथा पवित्र ग्रन्थों का निष्ठापूर्वक अध्ययन।

श्रोत्रिय — वह व्यक्ति जिसने वेदों का नियमित श्रवण-अध्ययन किया हो और आचार-व्यवहार में शुचिता रखता हो।

त्रयी-विद्या — ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का सम्मिलित ज्ञान।

त्रि-शुक्र / त्रि-शुक्रिय — तीनों वेदों का ज्ञाता; ‘तीन बार पवित्र’ कहलाने वाला विद्यार्थी।

अनुशासन — नियमबद्ध शिक्षण-प्रणाली; आदेश, नियंत्रण और शिक्षण-संहिताओं का समुच्चय।

वेदांग — वेदों को समझने हेतु आवश्यक सहायक विषय—शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।

कल्प — यज्ञों और अनुष्ठानों की शास्त्रीय विधि और कर्मकाण्ड संबंधी नियम।

निरुक्त — शब्दों के मूल, अर्थ और रहस्य का विवेचन करने वाला शास्त्र।

छन्द — पद्य में वर्ण-गणना, लय और मीटर-निर्धारण का शास्त्र।

ज्योतिष — ग्रह-नक्षत्रों की गति, खगोलीय गणना और यज्ञ-काल निर्धारण का शास्त्रीय विज्ञान।

विद्या — किसी विशिष्ट विषय का व्यवस्थित और गहन अध्ययन या ज्ञान।

वाक-वाक्यम — धार्मिक संवाद, शास्त्रार्थ तथा दार्शनिक वाद-विवाद की शास्त्रीय शैली।

इतिहास — नायकों, घटनाओं और परम्पराओं का प्राचीन वृत्तांत।

पुराण — सृष्टि, ब्रह्माण्ड और देवताओं से संबंधित आदिकालीन कथाओं तथा विचारों का संग्रह।

ब्रह्मोद्य — आध्यात्मिक विषयों पर प्रश्न-उत्तर, संवाद और रहस्य-चर्चा का वैदिक रूप।

क्षत्रिय भाट — युद्ध-वीरता और वंश-कथाओं का गुणगान करने वाले गायक या कथावाचक।

महाकाव्य — विशाल कथानकों, वीर-चरित और राष्ट्रीय आदर्शों पर आधारित दीर्घ काव्य-रचना।

परा विद्या — परम सत्य/ब्रह्म का ज्ञान; सर्वोच्च एवं आध्यात्मिक विद्या; उपनिषदों का मुख्य विषय।

अपरा विद्या — लौकिक एवं व्यावहारिक ज्ञान; चार वेद और छह वेदांग; परा से निम्न मानी गई।

अविद्या — वास्तविकता को न जानना; अज्ञान; कभी-कभी अपरा विद्या को भी अविद्या कहा गया।

ब्रह्म / परम सत्य — सर्वोच्च वास्तविकता; अनंत; परा विद्या का परम लक्ष्य।

वेदांत — वेदों का अंतिम एवं श्रेष्ठ दर्शन; उपनिषद-आधारित; परा विद्या का प्रतिपादन।

सर्व-विद्या-प्रतिष्ठा — वह उपाधि जो परा विद्या को समस्त विद्याओं की आधारशिला बताती है।

नारद–सनत्कुमार संवाद — छान्दोग्य उपनिषद का संवाद जिसमें अपरा विद्या की सीमाएँ और परा विद्या का महत्व स्पष्ट होता है।