VedicGurukul

यहाँ पर मुख्य बातें तीन स्तरों पर कही जा सकती हैं।

सबसे पहले सामाजिक और पारिवारिक स्थिति पर। आजकल एक विचार फैल रहा है कि “मैं ऐसा ही हूँ, मुझे मत बदलो”। यह वाक्य वास्तव में ज्ञानियों का नहीं बल्कि कुंठित और असंतुष्ट व्यक्तियों का होता है। यह भोगवाद और उपभोक्तावाद से उपजा है, जहाँ लोग सही–गलत का विवेक खो देते हैं। रिश्तों का आधार भी धन पर टिक गया है और परिवार टूट रहे हैं। एकल संतान या दो ही बच्चे होने से परिवार का स्वरूप सिकुड़ता जा रहा है—चाचा, ताऊ, बुआ जैसे रिश्ते खत्म हो रहे हैं। माता–पिता भी बच्चों के साथ नहीं रह पाते। यह संस्कृति और नैतिकता दोनों के विरुद्ध है।

दूसरा मुद्दा है जनसंख्या और संतानोत्पत्ति का। पहले समाज में औसतन चार–पाँच बच्चे होते थे, जिससे परिवार संतुलित रहते थे और कोई एक संतान साधु जीवन की ओर भी चली जाती थी। आज अच्छे और सक्षम लोग संतान कम पैदा कर रहे हैं, जबकि भोगवादी वर्ग स्वाभाविक रूप से संतान उत्पन्न करता जा रहा है। इसका परिणाम यह है कि उच्च गुण वाले लोग धीरे–धीरे कम हो रहे हैं। वास्तव में जनसंख्या विस्फोट जैसी बात भ्रम है, क्योंकि समाज को आगे बढ़ाने के लिए अच्छे और योग्य बच्चों की आवश्यकता होती है। इसलिए सक्षम लोगों को तीन–चार संतानें अवश्य पैदा करनी चाहिए ताकि संस्कृति और राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित रहे।

तीसरा पहलू शिक्षा और गुरुकुल का है। आज शिक्षा का व्यवसायीकरण हो गया है। फाइव स्टार स्कूलों की होड़ में लोग बच्चों की संख्या घटा रहे हैं। जबकि असली शिक्षा महँगी इमारतों से नहीं बल्कि चरित्रवान शिक्षकों और साधना से मिलती है। पहले सरकारी स्कूलों से ही बड़े–बड़े विद्वान निकले, पर अब शिक्षा केवल नौकरी और धन का साधन बन गई है। शिक्षा में नैतिकता और चरित्र निर्माण का ह्रास हुआ है। यही कारण है कि राष्ट्र निर्माण भी प्रभावित हो रहा है। समाधान यही है कि शिक्षा को पुनः चरित्र और संस्कृति पर आधारित बनाया जाए और गुरुकुल परंपरा को पुनर्जीवित किया जाए।

संक्षेप में, आज समाज भोगवाद और धनकेंद्रित सोच के कारण टूट रहा है। परिवारों का स्वरूप छोटा हो गया है, रिश्तों और संस्कृति का ह्रास हो रहा है, अच्छे लोग संतान कम कर रहे हैं और शिक्षा का व्यवसायीकरण हो गया है। यदि राष्ट्र और संस्कृति को बचाना है तो सक्षम लोग अधिक संतान उत्पन्न करें, परिवार का विस्तार बनाए रखें, शिक्षा को चरित्र आधारित करें और गुरुकुल जैसी व्यवस्थाओं को आगे बढ़ाएँ।