योगसूत्र में कहा गया है कि बिना तपस्या के योग की सिद्धि नहीं होती। उसी तरह गुरुकुल के ब्रह्मचारी के लिए भी तप आवश्यक है, क्योंकि तप के बिना ब्रह्मचर्य की सिद्धि असंभव है। तप का अर्थ है द्वंद्वों को सहना—जैसे ठंड, गर्मी, नींद, आलस्य या असुविधाओं को सहकर भी अपनी दिनचर्या का पालन करना। जब ब्रह्मचारी ठंड, वर्षा या रात्रि की थकान में भी प्रातः चार बजे उठकर स्नान और साधना करता है, तो यह उसकी तपस्या मानी जाती है। इसी तप से भीतर शक्ति और सहनशीलता का विकास होता है।
तप का उद्देश्य केवल शारीरिक कठोरता नहीं है, बल्कि मानसिक स्थिरता और आत्मबल प्राप्त करना भी है। बलवान वही है जो विपरीत परिस्थितियों और आकर्षणों से प्रभावित न हो। सुबह का समय विशेष रूप से तप और जागरण का समय है। प्रातःकाल का मंत्रजप और अग्नि-आह्वान मनुष्य के भीतर ऊर्जा और तेज का संचार करता है। शोधों से भी सिद्ध हुआ है कि सुबह उठते ही सकारात्मक विचार करने से दिनभर मन प्रसन्न और तनावमुक्त रहता है।
ब्रह्ममुहूर्त (सुबह 3 से 6 बजे तक) का समय साधना और शिक्षा के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इस समय किए गए कार्य और विचार जीवन पर गहरा प्रभाव डालते हैं। आलस्य और प्रमाद से बचकर नियमित रूप से समय पर उठना, स्नान करना, तप और अनुशासन का पालन करना ही ब्रह्मचर्य की वास्तविक साधना है।
यदि विद्यार्थी दृढ़ता से इस तप का पालन करें तो उनके शरीर, वाणी और नेत्रों में तेज प्रकट होगा, जीवन में बड़ी सफलताएँ मिलेंगी और वे संसार के संघर्षों के लिए समर्थ बनेंगे।