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वर्तमान समय में मनुस्मृति की आलोचना की जाती है, किंतु महर्षि मनु ने राजव्यवस्था में ऊंचे आदर्श प्रस्तुत किए हैं राजा की आवश्यकता और राजा कैसा होना चाहिए, यह वैदिक सिद्धांतों के अनुसार स्पष्ट किया गया है राजा की दैवीय उत्पत्ति का सिद्धांत महर्षि मनु ने प्रतिपादित किया और यह सिद्धांत आधुनिक लोकतंत्र से पहले भी व्यापक रूप से मान्य था मनुस्मृति के अध्याय सात के प्रथम श्लोक में राजा की योग्यता पर प्रश्न उठाया गया और दूसरे श्लोक में उसका उत्तर दिया गया राजा वही क्षत्रिय है जो ब्रह्म संस्कारों से युक्त हो अर्थात ज्ञान, विद्या और अध्यात्म के संस्कारों से संपन्न हो और समाज की रक्षा को अपना कर्तव्य समझे राजा अपने कर्तव्यों का पालन विधिपूर्वक करे और समाज में स्वीकार्यता प्राप्त करे राजा सर्वस्व का परिरक्षण करे, चारों ओर से न्यायपूर्वक सुरक्षा प्रदान करे और प्रजा, संसाधन, संस्कृति और सभ्यता की रक्षा करे राजा का कर्तव्य केवल बाहरी सुरक्षा नहीं बल्कि आंतरिक निष्पक्षता और न्यायपूर्ण शासन भी है महर्षि मनु ने अराजकता के खतरों की ओर ध्यान दिलाया, कहा कि राजा विहीन समाज अराजक हो जाता है और भय का वातावरण फैलता है इसलिए राजा पद का सृजन परमात्मा की प्रेरणा से हुआ ताकि सभी योग्य व्यक्ति समाज द्वारा स्वीकार्य और समाज की रक्षा करने वाले बने राजा को सभी वर्ण और आश्रम के लोगों की सुरक्षा करनी चाहिए और समाज के ताने-बाने को दीर्घकाल तक बनाए रखना चाहिए राजा का उद्देश्य चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सुनिश्चित करना है जब ऐसा राजा होता है, तो वह दीर्घकाल तक जनता के हृदय में स्थायी प्रभाव डालता है और उसका सम्मान भगवान के समान होता है महर्षि मनु का यह सिद्धांत वर्तमान काल में भी समाज और राज्य की सुरक्षा एवं शांति के लिए प्रासंगिक है।