क्रियायोग के अंतर्गत तीन प्रमुख अंग बताए गए हैं: तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रसाद। क्रियायोग का उद्देश्य समाधि भाव उत्पन्न करना और आंतरिक क्लेशों का तनुकरण करना है। क्लेश वे हैं जो चित्त को अशांत करते हैं, जैसे उल्टा-सीधा विचार और मानसिक अस्थिरता।
तप से शारीरिक और बाह्य क्लेश, स्वाध्याय से मानसिक और बौद्धिक क्लेश, और ईश्वर-प्रसाद से आध्यात्मिक क्लेश कमजोर और नष्ट होते हैं। स्वाध्याय का अर्थ केवल पुस्तक पढ़ना नहीं है, बल्कि आत्मनिरीक्षण और चिंतन करना है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने दोष, अवगुण और अहंकार को पहचानता है और उन्हें दूर करने का प्रयास करता है।
अहंकार, मोह, राग और द्वेष जैसे तत्व व्यक्ति के भीतर प्रकाश को ढक देते हैं। स्वाध्याय से इन्हें पहचानकर नियंत्रित किया जा सकता है। स्वाध्याय निष्काम कर्म और सेवा की भावना के साथ होना चाहिए, जिससे आंतरिक आनंद, पुरुषार्थ और कर्म की शक्ति बढ़ती है।
ध्यान में विचारों की श्रृंखला आती है, और उनका निरीक्षण करके समझा जा सकता है कि कौन सा विचार किस कारण से उत्पन्न हुआ। इस प्रक्रिया से समाधि के बीज अंकुरित होते हैं और चित्त की भूमि उर्वरा बनती है। स्वाध्याय का नियमित अभ्यास अभिमान घटाता है और व्यक्ति को ऋषियों के अनुसार प्रगतिशील बनाता है।
संक्षेप में, क्रियायोग और स्वाध्याय का अभ्यास व्यक्ति के आंतरिक विकास, मानसिक स्थिरता, क्लेशों के निवारण और समाधि की प्राप्ति के लिए अनिवार्य है।