परमात्मा केवल सरल व्यक्ति को ही प्राप्त होता है। प्रश्न उठता है कि सरलता व्यवहार की होनी चाहिए या भीतर की। सरल का अर्थ है सीधी अवस्था, जैसे सीधी लकड़ी, और जटिल का अर्थ है उलझी, टेढ़ी-मेढ़ी और गांठों से भरी अवस्था। यह सरलता शरीर की नहीं, बल्कि बुद्धि की है। सत्य बोलना सरल है क्योंकि उसमें कोई योजना नहीं बनानी पड़ती, जबकि झूठ बोलना जटिल है क्योंकि उसमें बहुत योजनाएं और सोचना पड़ता है। अहिंसा में कोई जटिलता नहीं है, पर हिंसा में यह सोचना पड़ता है कि कैसे, कब और किस प्रकार मारना है। इसी प्रकार चोरी और दूसरों की वस्तु लेने के प्रयास भी बुद्धि की जटिलता हैं। हृदय तो स्वभावतः सरल है, पर उलझनें बुद्धि में होती हैं। ऋषि मुनि बनने के लिए अनेक पुस्तकें पढ़ना आवश्यक नहीं है, पुस्तकें केवल मार्गदर्शन के लिए हैं ताकि व्यक्ति सरल हो सके। परंतु जब व्यक्ति विद्वत्ता दिखाने के लिए और पुस्तकें लिखने व पढ़ने में लग जाता है तो जटिलता और बढ़ जाती है। वास्तव में सरलता सहज है और जटिलता कठिन है, किंतु हम पहले से जटिल हैं इसलिए हमें सरलता कठिन लगती है। स्वार्थ, लोकभाव और पाप के कारण चित्त में गांठें पड़ती जाती हैं। यह स्थिति उस धागे के समान है जो छोटा होते हुए भी बार-बार उलझाकर इतनी गांठों से भर जाता है कि उसे सुलझाने में वर्षों लग जाएं और खींचने पर वह और कठोर हो जाए। इसी प्रकार पाप कर्म बार-बार करने से बुद्धि में गांठें पड़ जाती हैं और वे सरलता से नहीं खुलतीं। उन्हें सुलझाने के लिए तप और साधना करनी पड़ती है। कुछ गांठें इस जन्म के कारण हैं और कुछ पूर्व जन्म के कर्मों से आई हैं। इसलिए सबसे पहले संकल्प करना चाहिए कि आगे कोई नया दुष्कर्म न करें और धीरे-धीरे पूर्व के बंधनों को साधना, परोपकार और सामाजिक कार्यों द्वारा सुलझाएं। यही शास्त्र और साधना का उद्देश्य है और इसी से मानव जीवन की उन्नति होती है। यदि सरलता नहीं है तो न तो भक्ति संभव है, न ध्यान। जटिल बुद्धि में चित्त स्थिर नहीं होता और आंखें बंद करने पर भी असंख्य दृश्य और चिंताएं दिखाई देती हैं। जैसे जल में हलचल होने पर प्रतिबिंब स्पष्ट नहीं दिखता, वैसे ही जटिल चित्त में आत्मस्वरूप नहीं दिखता। किंतु जब व्यक्ति सरल होता है तो उसके अंतःकरण में उसका वास्तविक स्वरूप प्रकाशित हो जाता है। यही इस चर्चा का सार है।