यह अंश वेदों और आर्य समाज के लक्ष्य पर केंद्रित है। इसमें कहा गया है कि परमात्मा ने ऋषियों के माध्यम से वेदवाणी धरती पर दी और उसी वाणी के प्रचार-प्रसार के लिए आर्य समाज की स्थापना हुई। इसलिए हमें यह समझना चाहिए कि वर्तमान समय में हमारा मुख्य लक्ष्य क्या है। लक्ष्य यही है कि पहले स्वयं आर्य बनें और आर्यत्व को अपने जीवन में धारण करें। जब तक हम स्वयं आर्य नहीं होंगे, तब तक दूसरों को प्रभावित नहीं कर पाएंगे।
वक्ता कहते हैं कि यम और नियमों का पालन करना ही वास्तविक नैतिकता है, लेकिन प्रश्न यह है कि हममें से कितने लोग सच में लोभ, प्रलोभन, प्रतिष्ठा और स्वार्थ को त्याग कर सत्य के साथ खड़े हैं। यदि हम क्षणिक मोह और लोभ में गिर जाते हैं तो आत्मा परमात्मा से दूर हो जाती है। परमात्मा का आशीर्वाद और आनंद तभी मिलेगा जब उपासना में बैठते ही ध्यान लग जाए और भीतर आनंद का अनुभव हो, यदि ऐसा नहीं होता तो समझ लेना चाहिए कि अभी जीवन में बहुत सुधार की आवश्यकता है।
आत्मा के स्वरूप पर भी प्रकाश डाला गया है। आत्मा अनादि, अजर और अमर है, शरीर बदलते रहते हैं पर आत्मा का विकास ज्ञान और सत्य की ओर बढ़ने से होता है। आत्मा जितनी परमात्मा के निकट होती है, उतनी बड़ी मानी जाती है और जो आत्मा काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार में फंसी रहती है वह नीचे मानी जाती है। इसलिए हमें यह विचार करना चाहिए कि हम प्रकृति की ओर हैं या परमात्मा की ओर।
वेदों के अध्ययन और स्वाध्याय का महत्व बताया गया है। कहा गया कि ऋषि काल में जितने लोग स्वाध्यायशील थे, उतने आज नहीं हैं। हम सत्यार्थ प्रकाश तक सीमित रह गए हैं जबकि स्वामी दयानंद ने उसमें कई स्थानों पर वेद और अर्ष ग्रंथों के अध्ययन की प्रेरणा दी है। अर्ष ग्रंथ वेद के उपांग हैं और वेद तक पहुंचाने वाले मार्ग हैं, इसलिए पतंजलि के योगसूत्र, व्याकरण शास्त्र, षड्दर्शन आदि का अध्ययन आवश्यक है। सत्यार्थ प्रकाश केवल परिचय मात्र है, वास्तविक अध्ययन वेद और वेदांगों का होना चाहिए।
वक्ता यह भी कहते हैं कि आज हमने आधुनिक साधनों से पूरी दुनिया खोज ली, लेकिन वेदों की खोज नहीं की। वेद की विद्या आगे नहीं बढ़ रही और नए विद्वान भी कम हो गए हैं। पुराने ऋषियों और विद्वानों ने अपने समय में ग्रंथ लिखे, लेकिन आज नए ऋषियों और विद्वानों का अभाव है। यदि आज वेद की व्याख्या और प्रचार का कार्य प्रासंगिक रूप से नहीं किया जाएगा तो यह विद्या लुप्त हो जाएगी।
वेद का अध्ययन सरल है या कठिन, इस प्रश्न पर कहा गया कि वेद वास्तव में सुलभ ग्रंथ है, दयानंद ने भी यही कहा। कठिनाई वेद में नहीं है, कठिनाई हमारी समझ और हमारी जटिलताओं में है। इसलिए विद्वान और आचार्य वर्ग को आगे आकर वेदों को सरल बनाना होगा और सबके लिए सुलभ करना होगा।
इस प्रकार पूरा अंश इस बात पर बल देता है कि आर्य समाज का मूल लक्ष्य तभी पूरा होगा जब हम स्वयं आर्य बनेंगे, यम-नियमों का पालन करेंगे, आत्मा का विकास करेंगे और वेदों के स्वाध्याय को अपने जीवन में अपनाकर उसे समाज में सरल और सुलभ बनाएंगे।