VedicGurukul

यह अंश यजुर्वेद के अध्यात्म प्रधान चालीसवें अध्याय की व्याख्या पर आधारित है। इसमें बताया गया कि आज के सत्र में कुल 1975 मंत्र पूरे किए गए और यही ईशावास्य उपनिषद कहलाता है, जिसे वेदांत कहा जाता है, क्योंकि यह ज्ञान की पराकाष्ठा है। वेदांत का अर्थ है जहाँ ज्ञान की अंतिम स्थिति पहुँचती है और वहाँ यह स्पष्ट होता है कि जगत में जो कुछ भी है, सब परमात्मा से ही आच्छादित है।

वक्ता बताते हैं कि 39वें अध्याय में शरीर का भी स्वाहा कर दिया गया और आत्मा शरीर से अलग होकर परमात्मा का अनुभव करती है। ईशावास्यम का तात्पर्य है कि हर वस्तु में परमात्मा का वास है, जैसे वैज्ञानिक हर जगह ऊर्जा देखते हैं या धनलोलुप व्यक्ति हर जगह लाभ देखता है, वैसे ही ज्ञानी को हर जगह ईश का दर्शन होता है। यह जगत केवल स्थिर नहीं है बल्कि गति से भरा हुआ है, अणु-परमाणु भी घूम रहे हैं और उनमें भी परमात्मा विद्यमान है। विज्ञान जहाँ रुक जाता है, वहीं शास्त्र परम कारण तक पहुँचते हैं। विज्ञान प्रयोगों पर आधारित है और जब प्रयोगात्मक सत्य सामने आता है तो उसका वेदों से विरोध नहीं होता।

ईशावास्य उपनिषद आगे यह सिखाता है कि त्यागपूर्वक भोग करना चाहिए। संसार के संसाधनों का उपयोग संयम और नियमपूर्वक करना ही वास्तविक सुख देता है। लोभ और संग्रह प्रवृत्ति दुखों का कारण है। आधुनिक गुरु बड़े लक्ष्य रखने की प्रेरणा तो देते हैं, परंतु नियम और संयम का मार्ग नहीं बताते। वैदिक सिद्धांत कहता है कि जीवन को पवित्र रखते हुए कर्म करना और असीम रूप से आगे बढ़ना ही सच्ची उपलब्धि है। जंगल का वृक्ष बिना किसी देखभाल के प्राकृतिक विपत्तियाँ सहकर भी बड़ा होता है, जबकि बगीचे का पेड़ निरंतर देखभाल माँगता है। उसी प्रकार श्रेष्ठ कार्य करने पर जीवन में आनंद बना रहता है और सांसारिक दबाव नहीं आता, पर संग्रहवृत्ति से छोटी-सी उपलब्धि भी चिंता का कारण बन जाती है।

संतान और परिवार के विषय में कहा गया कि माता-पिता का जीवन चिंताओं में बीत जाता है। संतान को ईश्वर का अंश मानकर कर्तव्य करना चाहिए, क्योंकि संसार को अपनी इच्छा से चलाना संभव नहीं। ईशावास्य उपनिषद का संदेश है कि कर्म करते हुए ही जीवन जीने की इच्छा करनी चाहिए। जीवन का सूत्र कर्मठता है, धन प्राप्ति मात्र उद्देश्य नहीं है। सौ वर्ष तक कर्मशील रहना ही सच्चा सूत्र है। यदि व्यक्ति कर्महीन हो जाए तो जीवन रोग और दुख में उलझ जाता है।

परमात्मा की न्याय व्यवस्था पर भी प्रकाश डाला गया कि जो जैसा कर्म करता है, वैसा फल उसे अवश्य मिलता है। पापमय कर्म करने वाला अंधकारमय गति को प्राप्त होता है और पुण्य करने वाला प्रकाशमय गति को। तीसरे मंत्र में कहा गया कि विद्या और अविद्या दोनों की उपासना आवश्यक है। केवल संसार या केवल अध्यात्म, दोनों ही एकांगी मार्ग गहरे अंधकार में ले जाते हैं। विद्या और अविद्या का संतुलन जीवन की सफलता का रहस्य है। अविद्या यानी सांसारिक विद्या से मृत्यु पार होती है, साधन मिलते हैं और दुख दूर होते हैं, परंतु आनंद नहीं मिलता। आनंद केवल विद्या यानी आध्यात्मिक ज्ञान से ही प्राप्त होता है।

इसलिए दोनों का संतुलन आवश्यक है। सांसारिक साधन साधन मात्र हैं, उन्हें साधन की तरह प्रयोग करना चाहिए और वास्तविक सुख के लिए विद्या यानी आध्यात्मिक मार्ग अपनाना चाहिए। संतुलन साध लेने वाला व्यक्ति ही जीवन में सच्चा सफल है। यही वैदिक मार्ग है, जिसमें कर्म और भक्ति दोनों साथ-साथ चलते हैं।

अंत में हिरण्यमय पात्र का उदाहरण देकर कहा गया कि जैसे शरीर या बाहरी सौंदर्य सत्य को ढक देता है, वैसे ही परमात्मा ने भी सृष्टि को परतों से ढका है ताकि मनुष्य प्रयास और खोज करे, कर्महीन न बने। सत्य की खोज का यही प्रयोजन है। इसीलिए निष्कर्ष यह है कि जीवन में दृढ़ संकल्प करके सत्य मार्ग पर चलना चाहिए, विद्या और अविद्या दोनों का संतुलन रखना चाहिए, सौ वर्ष तक कर्मशील रहना चाहिए और दीर्घायु होने की कामना करनी चाहिए। यही ईशावास्य उपनिषद का संदेश है।