VedicGurukul

वक्ता बताते हैं कि क्षण दर्शन समन्वयक की नई पुस्तक का संस्करण तैयार किया जा रहा है और इसका पहला संस्करण काफी प्रसारित और पढ़ा गया है जिसमें दर्शनों के क्रम और उनके अध्ययन के क्रम का विस्तार से उल्लेख है तथा यह बताया गया कि वैश्विक और न्याय जैसे दर्शन से पहले और बाद में अन्य ग्रंथों का अध्ययन आवश्यक है जिससे दर्शन और विद्या की गहरी समझ मिलती है और शिष्य को विज्ञान और दर्शन का समन्वय समझ में आता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय दर्शन का शब्द विदेशी है और हमारे देश में केवल दर्शन कहा जाता था और प्राचीन काल में ऋषियों ने महाभारत काल के बाद संस्कृति और ज्ञान परंपरा की रक्षा हेतु छह प्रमुख दर्शन विकसित किए जिन्हें छह ऋषियों ने सूत्र रूप में व्यवस्थित किया जिसमें महर्षि जैमिनी का धर्म दर्शन, महर्षि कर्नाड का दर्शन, महर्षि गौतम का न्याय दर्शन, महर्षि पतंजलि का योग दर्शन, महर्षि कपिल का सांख्य दर्शन और महर्षि व्यास का वेदान्त दर्शन शामिल हैं और इन दर्शन सूत्रों के अध्ययन से मानव को मोक्ष और ज्ञान की दिशा में उन्नति मिलती है और दर्शन का अभाव होने पर व्यक्ति संसार में फंस जाता है और दर्शन का अर्थ है सम्यक दर्शन सम्पन्न होना जिससे विवेक द्वारा सत्य का अनुभव और संसार में निर्भयता प्राप्त होती है। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि योगसूत्र, न्याय और सांख्य दर्शन के बीच गहन समन्वय है और यदि दर्शन को उनके क्रम और परंपरा अनुसार पढ़ा जाए तो ज्ञान अधिक स्पष्ट और समग्र रूप से प्राप्त होता है तथा प्रत्येक दर्शन अपने आप में संप्रदाय विशेष से जुड़े होने के कारण अकेले पढ़ने पर उसका पूर्ण लाभ नहीं मिलता। इसके बाद उन्होंने प्राचीन ग्रंथों के पदार्थ विभाजन की तुलना आधुनिक विज्ञान से की जैसे पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और उनके परमाणु एवं आकाश या ईथर की अवधारणा जिससे उन्होंने वैदिक एटॉमिक मॉडल तैयार किया और यह बताया कि महर्षि कर्नाड ने पदार्थों के अतिरिक्त आठवें पदार्थ के रूप में आत्मा और नौवें के रूप में मन या मैएंड का विचार प्रस्तुत किया तथा मैएंड को आत्मा और प्रकृति के बीच मध्यस्थ तत्व बताया जो बुद्धि, चिंतन और अनुभूति का माध्यम है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दर्शन और विज्ञान का यह समन्वय केवल ग्रंथों के अध्ययन से नहीं बल्कि वर्तमान समय में बायोलोजी, फिजिक्स, केमिस्ट्री और कॉस्मोलॉजी के साथ जोड़कर चिंतन करने पर विकसित होता है और यदि विद्यार्थी के मन में यह विभाजन और दर्शन पहले से स्थिर हो जाए तो उसका चिंतन और सोचने की क्षमता अत्यधिक विकसित होती है और इस प्रकार वह वैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टि से गहन विवेक और ज्ञान प्राप्त कर सकता है और इसके माध्यम से आधुनिक विज्ञान और वैदिक दर्शन का समग्र और समन्वित अध्ययन संभव होता है।