VedicGurukul

वक्ता पूछते हैं कि वर्तमान में कुछ राजनीतिक दावों के माध्यम से सनातन धर्म को समाप्त करने की बात की जा रही है और यह पूछा गया कि क्या एक दिन गुरुकुल में चल रही सनातनी व्यवस्थाएँ भी समाप्त हो जाएँगी, जिस पर आचार्य जी बताते हैं कि सनातन और धर्म एक दूसरे के पर्यायवाची हैं और धर्म का वास्तविक स्वरूप सनातन ही है जो सदा से रहा है और रहेगा और धर्म के लक्षण प्राचीन ऋषियों के ग्रंथों में स्पष्ट रूप से बताए गए हैं जिसमें वेद (श्रुति) का धर्म, स्मृति ग्रंथों द्वारा तात्कालिक परिस्थितियों में प्रतिपादित धर्म, सदाचार तथा व्यक्तिगत और सामाजिक आचरण शामिल हैं और महर्षि मन्नू के श्लोकों के अनुसार धर्म का प्रतिपादन अंतः प्रेरणा से होना चाहिए अर्थात कर्म करते समय हृदय में उत्पन्न उत्साह या भय, लज्जा, संकोच जैसी भावनाएँ यह निर्धारित करती हैं कि कार्य धर्मसंगत है या नहीं और धर्म के यह दस लक्षण त्रिकालीन होते हुए भी स्थिर रहते हैं अर्थात भूत, वर्तमान और भविष्य में धर्म का मूल स्वरूप अपरिवर्तनीय है इसलिए इसे सनातन कहा जाता है और यदि इन लक्षणों को समाप्त कर दिया जाए जैसे सत्य और आक्रोध, तो अराजकता और मानवता का विनाश होगा और अहिंसा की अनुपस्थिति से भी मानव सभ्यता प्रभावित होगी और इस प्रकार सनातन धर्म का विनाश मानवता की समाप्ति के समान होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीतिक आलोचना या गलतफहमी का कारण व्यक्तिगत एजेंडा, स्वार्थ और अज्ञानता है तथा जो लोग सनातन के विषय में जानकारी नहीं रखते वे ग़लतफहमी या नकारात्मक टिप्पणी कर सकते हैं लेकिन इस पर प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता नहीं है और सबसे बड़ा शत्रु अज्ञान है इसलिए इस चैनल और इस ज्ञान चर्चा के माध्यम से लोगों तक वास्तविक ज्ञान पहुँचाना और सही जानकारी देना आवश्यक है और उन्होंने गुरु शिष्य परंपरा की भूमिका स्पष्ट करते हुए कहा कि गुरुकुल का उद्देश्य केवल भवन या प्रतिष्ठा नहीं बल्कि शुद्ध ज्ञान को जीवन और आचरण के माध्यम से सीखना और दूसरों तक पहुँचाना है और शिष्य तभी वास्तव में सीख पाता है जब उसका मन गुरु के मन के साथ समाहित हो जाए और दोनों के बीच सच्चा संयोग और प्रेरणा का संबंध स्थापित हो।