वक्ता पूछते हैं कि जीवन में धैर्य कैसे रखना चाहिए और यह कैसे उत्पन्न होता है, जिस पर आचार्य जी बताते हैं कि किसी भी गुण या सद्गुण को अपने जीवन में धारण करने के लिए सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि वह गुण क्या है और उसे अपनाने का लाभ क्या है, जिससे व्यक्ति स्वतः ही प्रेरित होता है और कर्म करने के लिए उत्साहित रहता है, फिर उन्होंने धैर्य की परिभाषा दी कि धैर्य वह है जब कोई कर्म कर लिया गया हो और फल की प्राप्ति तुरंत न हो तो उसके बीच के काल में मन में स्थिरता बनाए रखना और फल की प्राप्ति के लिए उत्सुकता या उद्विग्नता न होना, शांति बनाए रखना यही धैर्य है और इसे शास्त्रों में फल की आसक्ति न रखते हुए कर्म करना कहा गया है, इसका सम्बन्ध धर्म से जोड़ा गया है क्योंकि धर्म का लक्ष्य कर्म करना है न कि फल की प्राप्ति और व्यक्ति जब निष्काम भाव से कर्म करता है, फल की चिंता किए बिना, दीर्घकाल तक फल की प्रतीक्षा में स्थिर रहता है तो वह सच्चा धैर्यवान माना जाता है और इस प्रकार कर्म करने में आनंद प्राप्त होना आवश्यक है।
आचार्य जी आगे बताते हैं कि उदाहरण के लिए विद्यार्थी वार्षिक परीक्षा के लिए प्रयास करता है और यदि परिणाम तुरंत नहीं मिलता तो उसका मन विचलित नहीं होना चाहिए, इसी प्रकार धर्म के मार्ग पर प्रयासरत व्यक्ति जो निरंतर पुरुषार्थ करता है और सफलता न मिलने पर भी मार्ग नहीं छोड़ता, वही सच्चा धैर्यवान है और उसे धीर कहा जाता है, वेदों में योगी और परमात्मा के लिए भी धीर शब्द का प्रयोग आता है, और धर्म के लक्षणों के अनुसार व्यक्ति स्वतः ही धैर्यवान बन जाता है, उसे प्रयास करने के लिए अलग से प्रेरणा लेने की आवश्यकता नहीं होती।
आचार्य जी ने बताया कि शास्त्रोक्त, वेद और धर्मानुकूल कर्म करने वाले व्यक्ति को ही सच्चा आनंद प्राप्त होता है क्योंकि वह निष्काम भाव से कर्म करता है और कार्य करते हुए आनंदित रहता है, उसके कार्य का उद्देश्य केवल धर्म की स्थापना और कर्तव्य का पालन होता है न कि व्यक्तिगत लाभ प्राप्त करना, जैसे महापुरुष और ऋषि दयानंद जी अपने कर्तव्य कर्म करते हुए अपमान और आलोचना सहते हुए भी आनंदित रहते थे और उनका आनंद भीतर से प्रेरित था, वे अपने कार्य में निराशा या भय नहीं रखते थे, यही निष्काम धैर्य और आनंद का स्वरूप है।
आचार्य जी ने निष्कर्ष निकाला कि सच्चा धैर्यवान वही है जो कर्म करता हुआ आनंद अनुभव करता है, जिसका उद्देश्य केवल धर्म और कर्तव्य होता है, वह अपनी कर्मणा में तृप्त और संतुष्ट रहता है, लौकिक पदार्थों में केवल अल्प मात्रा का आनंद होता है, असली और पूर्ण आनंद केवल आत्मा के सांनिध्य में और धर्मसंगत कर्म करते हुए अनुभव किया जा सकता है।