आज वक्ता और दर्शक एक गुरु के पास आए हैं और पहले उन्होंने बताया कि आचार्य जी का सत्यसनातन परिवार से पुराना संबंध है, लेकिन वे पहली बार इस प्रकार के पोडकास्ट के माध्यम से अपनी बात रखने आए हैं, आचार्य जी का स्वागत किया गया, वे अलवर से हैं और वहां अपना गुरुकुल चलाते हैं, उनका गुरुकुल पहले से डॉक्यूमेंट्री में भी प्रस्तुत किया गया है, आज टीचर्स डे है और शिक्षक दिवस मनाने के संदर्भ में चर्चा होती है कि हम भारत विश्वगुरु कैसे बन सकते हैं, आचार्य जी बताते हैं कि वेदों में ऐसा आदेश है कि सारे संसार को आर्य बनाना चाहिए, वेद सनातन ज्ञान और परमात्मा का ज्ञान है, सनातन आदेश सदा के लिए है, विश्वगुरु बनने की प्रक्रिया भी सनातन काल से चली आ रही है, इसके लिए पुरुषार्थ आवश्यक है और यह पुरुषार्थ उन लोगों के माध्यम से होगा जिनमें भारतीय संस्कृति की गहरी समझ और आध्यात्मिक ऊर्जा होगी, आधुनिक संसाधनों का उपयोग करने वाले ये लोग भारत को विश्वगुरु बनने की ओर ले जाएंगे, आचार्य जी यह भी स्पष्ट करते हैं कि वर्तमान सरकारें जो बजट खर्च करती हैं, उसका गुरुकुल पर कोई विशेष प्रभाव नहीं है, पहले आदिकाल के गुरुकुल सरकारी अनुदान पर नहीं चलते थे, वे दक्षिणा पर चलाए जाते थे, आज भी हार्वर्ड और ऑक्सफोर्ड जैसी यूनिवर्सिटी सरकारी अनुदान पर नहीं चलतीं, पहले राजा अपने गुरुकुलों को अनुदान देते थे क्योंकि वहां पढ़ने वाले ब्रह्मचारी विद्यार्थी भविष्य में राजा बनते थे और गुरुकुल का पोषण करते थे, गुरु और शिष्य का संबंध उपनयन संस्कार के माध्यम से आजीवन चलता है और शिष्य जब उच्च पद पर पहुंचता है तो अपने गुरु और परंपरा का पालन करता है, जनेऊ संस्कार में गुरु शिष्य को तीन ऋण बताते हैं, शिक्षक का ऋण, शिक्षा का ऋण और सनातन संस्कृति का ऋण, जब तक यह ऋण उतारा नहीं जाता मुक्ति नहीं है, इस प्रकार से गुरुकुल परंपरा संवर्धित होती है, यह संवर्धन केवल दान मांगकर नहीं हो सकता, भारत को मांगने की स्थिति से हटकर ज्ञान देने की स्थिति में रहना होगा, तभी भारत विश्वगुरु बन सकता है।