VedicGurukul

प्रवचन में बताया गया कि कुछ वेद मंत्रों में योग विषय विशेष रूप से आया है और ऋषि दयानंद के अनुसार वेद सभी सत्य विद्याओं की पुस्तक हैं, स्वामी जी ने जब ऋग्वेद आदि भाष्यभूमि लिखा तो उसमें उस समय की सभी विद्या प्रदर्शित की गई, जिसमें योग विद्या भी शामिल है, योग विद्या संसार में दो प्रकार की विद्या के रूप में आती है एक है विद्या और दूसरी है अपरा विद्या या अविद्या, इसी अनुसार वेदों में भी इसकी पुष्टि होती है, स्वामी जी के अनुसार ध्यात्म विद्या परमात्मा से जुड़ने के लिए होती है और यही योग विद्या का मूल है, किसी भी विद्या की परिभाषा सरल होती है जैसे वायुयान चलाना, डॉक्टरी करना या अध्यापन करना, लेकिन योग विद्या मन को परमात्मा के साथ जोड़ने की विद्या है, यह कठिन है क्योंकि हमारी इन्द्रियों की प्रवृत्ति बाह्य है और उसे मोड़ना आसान नहीं, इसे केवल गुरु-शिष्य परंपरा में ही सीखा जा सकता है, जैसा बालक सहारे से चलना सीखता है वैसे ही मन को स्थिर करना और वृद्ध करना गुरु से ही संभव है, योग और ध्यान की मुख्य विधि संसार से मन को रोकना और परमात्मा में लगाना है, संसार में राग और आकर्षण दो प्रकार के होते हैं जिन्हें नियंत्रित करना होता है, अभ्यास से मन को रोककर परमात्मा में लीन किया जाता है, यही योग विद्या का उद्देश्य है, इस विद्या का अध्ययन जीवन में स्थिरता, चेतना और आत्मा को शक्तिशाली बनाने के लिए किया जाता है, इसमें ईश्वर का वर्णन भी आता है जैसे विष्णु जी ने सृष्टि को तीन पैरों में विभाजित किया और प्रकाश, अदृश्य और अंतरिक्ष के तीन प्रकार की सृष्टि बनाई, प्रकाश वाले जगत में सूर्य, चंद्रमा आदि हैं, वैज्ञानिक दृष्टि से इसका मात्र चार प्रतिशत ही दृश्य है और बाकी अदृश्य जगत है, यह योग विद्या संसार के उद्देश्य को समझाती है कि परमात्मा ने यह संसार मनुष्य के लिए बनाया, धन और संसाधन भोग और अपवर्ग के लिए दिए ताकि व्यक्ति उन्हें समझकर आनंद प्राप्त करे, जैसे साइकिल चलाना सीखना आनंद देता है, वैसे ही संसार का सही उपयोग ज्ञान और योग के माध्यम से जीवन को आनंदमय बनाता है, संसार का तृष्णा और भोगी जीवन दुख और असंतोष उत्पन्न करता है, सात्विक व्यक्ति ऊर्जावान और तृप्त रहता है, वेद हमें परमात्मा की शक्ति को समझने और आत्मा का उसके साथ योग करने का मार्ग दिखाते हैं, जब तक हमारे आत्मा का योग परमात्मा से नहीं होगा तब तक पूर्ण आनंद की स्थिति प्राप्त नहीं होगी, अन्य संप्रदायों में वैराग्य हो सकता है लेकिन सच्चे परमात्मा के ज्ञान और योग के बिना पूर्ण आनंद नहीं प्राप्त होता।