VedicGurukul

इस कविता में वृक्ष के माध्यम से मनुष्य जीवन की तुलना करते हुए प्रेरणा दी गई है कि आंधी में भी अड़े रहो, पुष्पित और फलते रहो, जड़ों से जुड़े रहो, शाखाओं में विस्तार हो, वनलता बनकर लिपटे रहो, समर्पण में सिमटे रहो, दृढ़ और लचीला बनकर अस्तित्व बनाए रखो, फलवान और झुकते रहो, खग विहग के लिए छाँव बनाओ, यात्रियों के विश्राम और सुख के लिए स्थान बनाओ, चेतना हारी नहीं और कोपल की तरह नये बीज फूटने की तैयारी करो, असंख्य बीज बिखेरो और अपने एक को अनंत में परिवर्तित करो, इसी प्रकार नवजीवन और सपनों की सृष्टि होती है, वृक्ष सम अड़े रहो और जड़ों से जुड़े रहो।

इसके बाद गायत्री मंत्र की महिमा और उसका चंद समझाया गया, बताया गया कि वेदों में गायत्री छंद में सर्वाधिक मंत्र हैं और महर्षि स्वामी दयानंद जी ने इस मंत्रों की व्याख्या समाधि में स्थित होकर की, समाधि में स्थित होने का तात्पर्य है कि परमात्मा का सांनिध्य प्राप्त होता है और मंत्र के भाव प्रकट होते हैं, गायत्री छंद 24 अक्षरों का होता है, यह सावित्री भी कहलाता है और सविता देवता के अंतर्गत आता है, मंत्र में दो पाद और एक तीसरा चरण होता है जिसमें आठ अक्षर होते हैं, मंत्र का अर्थ सरल भाषा में समझाया गया ताकि इसका भाव आत्मसात हो।

फिर नमस्ते अग्न ओजसे मंत्र की व्याख्या की गई जिसमें ओजस का अर्थ ऊर्जा, बल और आवेग के रूप में बताया गया, यह स्थिर चीज़ में हलचल पैदा करता है और व्यक्ति के भीतर जड़ता हटाकर उसे आगे बढ़ने की शक्ति देता है, मंत्र में तीन चरण हैं जिनमें प्रत्येक चरण में परमात्मा को संबोधित कर ओजस प्रदान करने, जड़ता हटाने और बाधक तत्वों को दूर करने की प्रार्थना की जाती है, घृणंती का अर्थ स्तुति और ग्रहण करना है, देव कृष्टया का अर्थ है आकृष्ट होकर ग्रहण करना, अमयी अमित्रम और दया का अर्थ है बलपूर्वक मित्र के समान बाधक तत्वों को हटाना, मंत्र का उद्देश्य साधक की स्थिति को उन्नत करना और साधारण से विशेष स्थिति तक ले जाना है, इस प्रकार यह मंत्र साधक के मन और आत्मा में ऊर्जा, प्रेरणा और गति उत्पन्न करता है ताकि वह परमात्मा के साथ योग स्थापित कर सके।

अंत में रामधारी सिंह दिनकर की पंक्ति के माध्यम से यह बताया गया कि जड़ता को विनष्ट करने और आगे बढ़ने के लिए भूकंप जैसी शक्ति, ओजस की आवश्यकता है, और प्रार्थना की गई कि हे अग्नि स्वरूप परमात्मा हम सब में वह ओजस भर दो जिससे हम साधारण स्थितियों से ऊपर उठकर आत्मकल्याण और परमात्मा की ओर अग्रसर हो सकें।