VedicGurukul

यह पूरा भाषण सामवेद के ग्यारहवें मंत्र की गूढ़ व्याख्या है जिसमें वक्ता सबसे पहले ऋषि परंपरा और स्वामी दयानंद जी की चर्चा करते हैं कि वेदों की व्याख्या केवल बौद्धिक नहीं बल्कि समाधि की स्थिति में संभव है क्योंकि वहीं परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त होता है और वहीं से मंत्र का वास्तविक भाव प्रकट होता है। इसके बाद वे गायत्री छंद की विशेषता बताते हैं कि वेदों में सर्वाधिक मंत्र इसी छंद में रचे गए हैं और इसका विन्यास चौबीस अक्षरों का है जिसमें दो पाद और अंतिम चरण मिलकर मंत्र का सम्पूर्ण भाव प्रकट करते हैं। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र को उदाहरण स्वरूप सामने रखकर वे यह स्पष्ट करते हैं कि पहले दो पादों में मुख्य विचार प्रकट होता है और अंतिम चरण में प्रार्थना या विशेष आग्रह व्यक्त होता है।

यही क्रम सामवेद के ग्यारहवें मंत्र में भी है जिसमें सबसे पहले अग्नि रूपी परमात्मा को प्रणाम करते हुए ओजस की याचना की गई है। ओजस का अर्थ केवल शक्ति या तेज नहीं बल्कि वह आंतरिक आवेग है जो जड़ता को तोड़कर गति देता है। आधुनिक विज्ञान की भाषा में इसे मोमेंटम कहा जा सकता है। जिस प्रकार अग्नि किसी पदार्थ को भस्म करके उसकी जड़ता को मिटा देती है और उसे ऊपर उठा देती है, वैसे ही परमात्मा का ओजस साधक को आलस्य और स्थिरता से मुक्त करके ऊँची अवस्थाओं की ओर ले जाता है। दूसरा चरण देव से प्रार्थना करता है कि वे इस ओजस को साधक में आकर्षित कराएँ और उसे धारण करने योग्य बनाएँ। तीसरे चरण में “अमयी अमित्र मर्दया” कहकर अमित्रों को दूर करने की प्रार्थना की गई है। अमित्र का आशय केवल बाहरी शत्रुओं से नहीं बल्कि उन बंधनों से है जो मित्र जैसे प्रतीत होते हुए भी बाधक हैं, जैसे मोह, राग, आसक्ति, संस्कार या सांसारिक बंधन। इन्हें बलपूर्वक हटाए बिना साधक की प्रगति संभव नहीं।

वक्ता आगे समझाते हैं कि साधक अक्सर एक स्थिति पर अटक जाता है, चाहे वह साधना कर रहा हो, ध्यान कर रहा हो या स्वाध्याय, परंतु ऊँची अनुभूति तक नहीं पहुँच पाता। यह अटकाव ही जड़ता है और यही अमित्र है। इसलिए परमात्मा से प्रार्थना की जाती है कि वह अग्नि स्वरूप होकर साधक को ओजस प्रदान करे, उसके भीतर गति और आवेग भरे और अमित्रों को दूर करे। ओजस ही वह शक्ति है जो आत्मा को साधारण अवस्था से उठाकर विशेष अवस्था तक पहुँचा देती है। वक्ता दिनकर की पंक्ति उद्धृत करते हैं कि जड़ता के विनाश के लिए भूचाल चाहिए और यही भूचाल ओजस है।

भाषण के अंत में वक्ता सबके लिए प्रार्थना करते हैं कि हे अग्नि स्वरूप परमात्मा, हम आपको प्रणाम करते हैं, आप हम सबमें वह ओजस भर दीजिए जिससे हम साधारणता से ऊपर उठ सकें, अमित्र रूपी बंधनों से मुक्त हो सकें और आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर होकर परमात्मा की ओर बढ़ सकें। यह प्रार्थना केवल एक मंत्र का अर्थ नहीं बल्कि साधना का सार है कि साधक निरंतर प्रगति करे, जड़ता से मुक्त हो और परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त करे।