VedicGurukul

यह पूरा वक्तव्य लेखक की उस दृष्टि को प्रकट करता है जिसमें गुरुकुल केवल पठन पाठन का केंद्र न होकर शोध और अनुसंधान का भी प्राणस्थान बन सके। लेखक यह स्पष्ट करता है कि गुरुकुल में शोध कार्य का मूल उद्देश्य वैदिक ग्रंथों, अर्ष ग्रंथों और प्राचीन शास्त्रों को सुव्यवस्थित रूप से आधुनिक काल के लिए सुलभ बनाना है। इसी क्रम में कई बड़े शोध कार्य चल रहे हैं जैसे छह दर्शनों का समन्वय करना, ताकि विभिन्न संप्रदायों में हुए विभाजनों को समाप्त किया जा सके और प्राचीन ऋषियों के सूत्रों की वास्तविक कड़ियाँ प्रमाण सहित सामने आ सकें। इसी प्रकार पाणिनीय अष्टाध्यायी का सरलीकरण करके उसे व्याकरण के अध्ययन की सुगम और प्रमाणिक पद्धति के रूप में प्रस्तुत करने का कार्य चल रहा है जिससे हजारों सूत्रों के स्थान पर आवश्यक सूत्रों के माध्यम से विद्यार्थी संस्कृत के गूढ़ तंत्र को समझ सकें।

इसी शोध परंपरा में महर्षि वाल्मीकि की रामायण पर भी गहन अनुसंधान हो रहा है ताकि उसमें समय समय पर हुए प्रक्षेपों को चिन्हित करके उसके शुद्ध स्वरूप को स्थापित किया जा सके क्योंकि भगवान राम का सत्य इतिहास केवल वाल्मीकि रामायण में ही निहित है और जब भारत अपनी सांस्कृतिक चेतना के अमृतकाल में प्रवेश कर रहा है तब यह आवश्यक है कि इतिहास पुरुष राम के जीवन का यथार्थ स्वरूप समाज के सामने आए। साथ ही वेदों और शास्त्रों में छिपी वैज्ञानिक अवधारणाओं को खोजने और प्रमाणित करने का कार्य भी धीरे धीरे आगे बढ़ रहा है क्योंकि ऋषियों की दृष्टि से प्रकट हुए वे रहस्य आधुनिक विज्ञान की प्रयोगशालाओं में भी सिद्ध हो रहे हैं।

लेखक बताता है कि गुरुकुल में ध्यान और योग की प्राचीन विधियों पर भी अनुसंधान हो रहा है ताकि वर्तमान समाज में प्रचलित अस्पष्ट ध्यान पद्धतियों से अलग वास्तविक वैदिक ध्यान की प्रणाली सामने लाई जा सके जो ऋषियों को आत्मानुभूति और ब्रह्मांडीय सत्य तक ले जाती थी। यह शोध केवल विद्वानों के लिए नहीं बल्कि प्रत्येक मानव के जीवन में आवश्यक है क्योंकि चित्त की शुद्धि और आत्मिक प्रगति के लिए ध्यान अपरिहार्य है।

साथ ही वक्ता इस गंभीर तथ्य पर भी ध्यान खींचता है कि शोध कार्य संसाधनों के अभाव में टिक नहीं पाता। भारत में बड़ी इमारतों और बाहरी दिखावे पर दान तो आता है पर शोध और ज्ञान की स्थायी व्यवस्था के लिए समाज आगे नहीं बढ़ता जबकि यही वह क्षेत्र है जो भारत को फिर से विश्वगुरु बना सकता है। लेखक कहता है कि आचार्य के स्वाभिमान के विपरीत है दान माँगना, किंतु संस्कृति के ऋण को उतारने और वेदों पर स्थायी शोध केंद्र स्थापित करने के लिए उन लोगों को आगे आना होगा जो इस कार्य की महत्ता को वास्तव में समझते हैं।

इस प्रकार यह वक्तव्य गुरुकुल को केवल शिक्षा का स्थान नहीं बल्कि वैदिक परंपरा, शास्त्रीय शोध, योग साधना और वैज्ञानिक अन्वेषण का ऐसा केंद्र मानता है जो समाज को अपनी जड़ों से जोड़कर भविष्य की नई दिशा प्रदान करेगा। यह आवाहन है कि शोध की यह परंपरा केवल कुछ विद्वानों तक सीमित न रहकर पूरे समाज के सहयोग से फलदायी बने और भारत की सांस्कृतिक चेतना को पुनः जगाकर उसे विश्व समुदाय के लिए ज्ञान का दीपक बना सके।