VedicGurukul

आज की चर्चा का मुख्य विषय यह है कि प्रत्येक व्यक्ति चाहे कितना भी अच्छा और योग्य क्यों न हो, उसकी उन्नति एक सीमित स्तर तक रुक जाती है क्योंकि वह अपनी क्षमताओं का पूर्ण आकलन नहीं कर पाता और अपनी वास्तविक शक्ति को नहीं जान पाता जिससे वह सोचता है कि आगे बढ़ना संभव नहीं है इस स्थिति में समाधान दो प्रकार से है या तो व्यक्ति अपनी अंतर चेतना के विकास के माध्यम से भीतर से ही प्रेरणा प्राप्त करे और स्वयं अपनी क्षमताओं का विस्तार करे या फिर एक योग्य मार्गदर्शक या गुरु की सहायता ले जिससे उसकी उन्नति का मार्ग स्पष्ट हो जाए और जब वह योग्य गुरु मिल जाए तो उस पर पूरा विश्वास और समर्पण करना आवश्यक है क्योंकि गुरु की भूमिका केवल रूप या शब्द की मिठास तक सीमित नहीं है बल्कि वह वही होना चाहिए जिसने जिस मार्ग पर आप चलना चाहते हैं, उसे स्वयं पार किया हो और उसके शिष्यों के हित में उसकी प्रेरणा निरंतर हो ताकि शिष्य अपने स्वभाव के अनुरूप उन्नति करे और गुरुकुल परंपरा में यही सिद्धांत है कि गुरु शिष्य का मार्गदर्शन करे और शिष्य पूरी तैयारी के साथ उस मार्ग पर विश्वास और समर्पण के साथ चले और जब गुरु से प्रेरणा प्राप्त हो जाए तो निरंतर प्रयास करना चाहिए रुकना नहीं चाहिए क्योंकि यदि बीच में रुकेंगे तो तमस और माया का आवरण भ्रम उत्पन्न करेगा और लक्ष्य से विचलित करेगा इस निरंतर चलने की प्रक्रिया में व्यक्ति का स्वभाव और पुरुषार्थ एक हो जाता है और तमस का आवरण धीरे-धीरे समाप्त होता है और व्यक्ति आलस्य और प्रवाद रहित होकर अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है इस प्रक्रिया को योग की भाषा में विवेक ख्याति कहा जाता है जब व्यक्ति स्वयं निर्णय लेने, उचित मार्ग चुनने और आगे बढ़ने में सक्षम हो जाता है और उसके भीतर पूरी जागरूकता और शक्ति का विकास हो जाता है फिर उसे किसी बाहरी निर्देश की आवश्यकता नहीं रहती तथा जीवन के प्रत्येक स्तर पर निरंतर प्रयास करना आवश्यक है क्योंकि जीवन के हर पड़ाव पर नई चुनौतियां और मानसिक संघर्ष होंगे इसलिए व्यक्ति को अपनी ऊर्जा और संसाधनों का संतुलित उपयोग करना सीखना होगा जैसे कि धन का सदुपयोग करना ताकि आवश्यकतानुसार कुछ संचय हो, कुछ तत्काल प्रयोग में आए और कुछ आगे बढ़ने के लिए निवेश हो यही जीवन ऊर्जा का संतुलित उपयोग है और इसी संतुलन से व्यक्ति का विकास पूर्ण होगा यदि वह रुक गया या असंतुलित रहा तो उसकी उन्नति सीमित रह जाएगी और जीवन का संपूर्ण कल्याण और समाज में उच्च आदर्श स्थापित करना संभव नहीं होगा इसलिए ब्रह्मचारियों के उपदेश अनुसार व्यक्ति को निरंतर जागृत रहना, अपने प्रयासों में दृढ़ता रखना, योग्य गुरु से प्रेरणा प्राप्त करना और जीवन ऊर्जा का संतुलित नियोजन करना आवश्यक है ताकि वह उच्चतम स्थिति तक पहुंचकर स्वयं और समाज के कल्याण में योगदान दे सके