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इस प्रसंग में हनुमान जी के उड़ने और उनके अद्भुत यान के वर्णन का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है और बताया गया है कि वाल्मीकि रामायण में हनुमान जी के उड़ने के कई श्लोक उपलब्ध हैं, विशेषकर सुंदरकांड में श्लोक संख्या 56 से 69 तक, जिनमें उनके उड़ने की विधि, गति, रूप और प्रभाव का विस्तार से वर्णन है और इस वर्णन को आधुनिक विमान, जेट या रॉकेट की तकनीक के अनुरूप समझाया गया है हनुमान जी जब उड़ने लगे तो उन्होंने अपने भुजाओं को फैलाया और यह दृश्य ऐसा प्रतीत हुआ जैसे पर्वत के शिखरों से पांच फन वाले सांप निकल रहे हों, जो आज के जेट विमान के प्रोपेलर के समान प्रतीत होता है और उनके उड़ने की गति इतनी तीव्र थी कि महासागर की लहरों पर उनका प्रभाव स्पष्ट हो रहा था जैसे वे समुद्र को पीते हुए आगे बढ़ रहे हों वायु की दिशा और ध्वनि के प्रभाव का भी ध्यान रखा गया था और हनुमान जी की आँखों में चमक, विद्युत प्रवाह के समान वर्णित की गई थी, जो आधुनिक इलेक्ट्रिक लाइट या हवाई जहाज की हेडलाइट से तुलना की जा सकती है उनके पीछे बंधा हुआ सानु बंध और पूँछ लांगुलम ऐसा चित्रित किया गया है जैसे आधुनिक हवाई जहाज की पूँछ या रोटर दिशा प्रदान कर रहा हो और उनकी गति इतनी थी कि उनकी परछाई और प्रभाव समुद्र और वातावरण में दिखाई दे रहे थे, जिससे उनकी तीव्र गति और शक्ति का अनुभव होता है इस पूरे वर्णन में हनुमान जी की पूँछ, शरीर, नेत्र, प्रकाश और वेग का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है और प्रत्येक श्लोक में उनके उड़ने की विधि, प्रभाव और गति का विवरण आधुनिक तकनीकी दृष्टिकोण से समझाया गया है जिससे यह सिद्ध होता है कि यह केवल कल्पना नहीं बल्कि किसी वस्तुस्थिति पर आधारित विज्ञान है और इस वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हमें हनुमान जी की वीरता, शक्ति और अद्भुत तकनीकी क्षमता का बोध होता है और हमें उनकी उपासना और स्तुति करते समय यह समझना चाहिए कि उनके पास अद्भुत वैज्ञानिक और यांत्रिक शक्तियां थीं और उनका यह विवरण हमें इतिहास, विज्ञान और साहित्य का सम्मिलित ज्ञान प्रदान करता है और श्रद्धा और समझ के साथ उनकी प्रेरणा से जीवन में भी उच्च गुणों का विकास संभव है