शिक्षा का उद्देश्य जैसा कि पहले ही संकेत किया जा चुका है, उस समय शिक्षा को अपने-आप में लक्ष्य नहीं माना जाता था, अपितु केवल एक साधन – ब्रह्मवर्चस् अर्थात् पवित्र ज्ञान या परम तत्त्व-ज्ञान की प्राप्ति – की ओर ले जाने वाला मार्ग समझा जाता था। वैदिक साहित्य में विभिन्न स्थलों पर इस बात […]
शाकल — ऋग्वेद की मुख्य शाखा; शाकल्य ऋषि द्वारा संकलित, उत्तर भारत में प्रचलित; उदाहरण: शाकल संहिता। अश्वलायन — ऋग्वेद शाखा; यज्ञ-विधि केंद्रित; अश्वलायन ऋषि; कुरुक्षेत्र क्षेत्र; उदाहरण: अश्वलायन गृह्यसूत्र। शांखायन — ऋग्वेद शाखा; ब्राह्मण ग्रंथों के लिए प्रसिद्ध; शांखायण ऋषि; मालवा क्षेत्र; उदाहरण: शांखायन ब्राह्मण। माण्डूकायन — प्राचीन ऋग्वैदिक शाखा; अधिकांश भाग विलुप्त; प्राचीन […]
विभिन्न प्रकार के ग्रन्थ और अध्ययन-विषय इस काल में विदित और विकसित हुए तथा साहित्य के विविध रूपों में प्रकट हुए। जैसा कि पूर्वोक्त है, अध्ययन का तकनीकी नाम वैदिक-अध्ययन अर्थात् स्वाध्याय है, जिसकी महिमा का वर्णन शतपथ ब्राह्मण और तैत्तिरीय आरण्यक में अत्यन्त सुन्दर रूप से किया गया है। अन्यत्र विद्वानों के आनन्द का […]
प्राचीन भारत में शिक्षा-व्यवस्था सार्वत्रिक आदर्शों पर आधारित थी, जिसका केंद्र ब्रह्मचर्य था। यह शिक्षा-प्रणाली व्यवस्थित और निश्चित थी तथा अथर्ववेद में इसका विशेष रूप से वर्णन मिलता है, जहाँ ब्रह्मचर्य को भारतीय सामाजिक और धार्मिक जीवन की मूलभूत आधारशिला माना गया है। यद्यपि अध्ययन के विषय बदलते रहे, किंतु शिक्षण की मूल संरचना, अनुशासन […]
प्राचीन भारतीय शिक्षा और पाठ संरक्षण: संहिता के संपादकों ने केवल स्तोत्र चुनने का काम नहीं किया, बल्कि वैदिक वाणी को उसकी मूल शुद्धता में सुरक्षित रखने हेतु यांत्रिक और भाषिक उपाय विकसित किए; पवित्र शब्द के प्रति श्रद्धा के कारण शब्दगत प्रामाणिकता लंबे समय तक बनी रही; संपादकों ने ऋषियों के स्वराघात और वैकल्पिक […]
भाग–I : ब्राह्मणीय शिक्षा अध्याय I – वैदिक संकल्पनाएँ एवं पारिभाषिक शब्द (1) वेद (1) · संहिता (3) · मंत्र (2) · ब्राह्मण (5) · यज्ञ (7) अध्याय II – ऋग्वैदिक शिक्षा (17) ऋग्वेद का विकास एवं विषयवस्तु (17) · पाठ का संरक्षण (20) · साहित्यिक क्रियाकलाप (22) · तप को ज्ञान का साधन मानना […]
विषय-सूची (अंक पृष्ठ-बोधक हैं) अध्याय–1 : भौतिकी (Physics) | पृष्ठ 1–36अग्निविद्या–1 | ऊर्जा अविनाशी एवं अमर है–1 | ऊर्जा का रूपान्तरण (Transformation of Energy)–1 | ऊर्जा पंजीभूत है–2 | गविष्टि एवं अश्वमिष्टि–2 | वैश्वानर अग्नि (Universal Energy)–2 | अग्नि का विराट् रूप (Universal Energy)–2 | ऊर्जा के विभिन्न नाम–2 | ऊर्जा व्यक्त-अव्यक्त, स्थूल-सूक्ष्म–3 | ऊर्जा […]
यह विवरण गुरुकुल, शिक्षा और भारतीय ज्ञान-परंपरा को गंभीरता से समझने वालों के लिए उपयोगी है। अलबरूनी की पुस्तक का संदर्भ अलबरूनी ने स्वयं कई वर्षों तक भारत में रहकर संस्कृत सीखी और आचार्यों से संवाद किया। गुरुकुल व्यवस्था पर अलबरूनी का विस्तृत विवरण शिक्षा व्यवस्था का आधार: गुरुकुल अलबरूनी लिखते हैं कि भारत में […]
चित्तूर तालुक (Chittoor Talook) भाषा / प्रकार अन्य जातियाँ (All other Castes – M F T) कुल (Grand Total – M F T) मुसलमान विद्वान (Musulman Scholars – M F T) कुल हिंदू व मुसलमान (Total Hindoos & Musalman – M F T) औडायनम (Audayanum) – – – 8 – 8 – – – 8 […]
और विद्वानों की संख्या का विवरण** चित्तूर तालुक (Chittoor Talook) भाषा / विद्यालय प्रकार विद्यालय एवं कॉलेज (Schools & Colleges – S C T) ब्राह्मण विद्वान (Bramin Scholars – M F T) वैश्य विद्वान (Vysea Scholars – M F T) सूद्र विद्वान (Soodra Scholars – M F T) औडायनम (Audayanum) – 1 1 8 – […]
०१. अग्नि विद्या (धातुकर्म) परिभाषा: धातुओं को पिघलाने, ढालने, मिश्रधातु बनाने और धातु से औज़ार तैयार करने का विज्ञान।उदाहरण: लोहा पिघलाकर उससे तलवार, औज़ार या मशीन के पुर्ज़े बनाना। ०२. वायु विद्या (पवन संबंधी अध्ययन) परिभाषा: हवा की गति, दिशा और उसके प्रभावों का अध्ययन।उदाहरण: पवन ऊर्जा से बिजली पैदा करने वाले पवन चक्की (Windmill) […]
1. ब्रिटिश शासन से पहले भारत में व्यापक और उन्नत शिक्षा प्रणाली थी। “…जब ब्रिटिश प्रशासक भारत आए, तो उन्होंने चीज़ों को जैसा था वैसा अपनाने के बजाय उन्हें उखाड़ना शुरू कर दिया…” हर जगह शिक्षा। ब्रिटिश शासन से पहले भारत में विकेंद्रीकृत लेकिन अत्यंत व्यापक शिक्षा व्यवस्था थी। थॉमस मुनरो जैसे पर्यवेक्षकों ने कहा […]
प्रदत्त विवरण से ऐसा प्रतीत होता है कि गुरुकुल प्रायः लंबे समय तक चलते थे: साधारणतः प्रातःकाल लगभग 6 बजे आरम्भ होते थे, जिनके बीच भोजन आदि के लिए एक या दो संक्षिप्त अवकाश होते थे, और सूर्यास्त के समय अथवा उससे भी कुछ देर बाद समाप्त होते थे। इन विषयों पर विभिन्न कलेक्टरों से […]
इस प्रसंग में हनुमान जी के उड़ने और उनके अद्भुत यान के वर्णन का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है और बताया गया है कि वाल्मीकि रामायण में हनुमान जी के उड़ने के कई श्लोक उपलब्ध हैं, विशेषकर सुंदरकांड में श्लोक संख्या 56 से 69 तक, जिनमें उनके उड़ने की विधि, गति, रूप और […]
आज की चर्चा का मुख्य विषय यह है कि प्रत्येक व्यक्ति चाहे कितना भी अच्छा और योग्य क्यों न हो, उसकी उन्नति एक सीमित स्तर तक रुक जाती है क्योंकि वह अपनी क्षमताओं का पूर्ण आकलन नहीं कर पाता और अपनी वास्तविक शक्ति को नहीं जान पाता जिससे वह सोचता है कि आगे बढ़ना संभव […]
मनुष्य के जीवन में जो निरंतर भागदौड़ है उसका मूल कारण यही है कि उसने सुख को ठीक से समझा नहीं और साधन को ही साध्य मान लिया। मन में यह ख्याल चलता रहता है कि कुछ पाना है, कहीं पहुँचना है, किसी से जुड़ना है या कुछ धन कमा लेना है। जब तक वह […]
यह पूरा प्रसंग ब्रह्मानंद वल्ली के आठवें अनुवाक की व्याख्या है जिसमें ऋषियों ने मनुष्य के आनंद की गहराई और उसकी सीमाओं को स्पष्ट किया है। सामान्यतया हम आनंद को इंद्रियों की संतुष्टि या मनोविकारों की पूर्ति तक ही सीमित मान लेते हैं, किंतु ऋषियों ने इसका सूक्ष्म और गहन विवेचन किया। उन्होंने कहा कि […]
यह पूरा वर्णन हमें यह समझाता है कि भारत की परंपराएँ कितनी गहरी और वैज्ञानिक रही हैं और समय के साथ उनमें कितना परिवर्तन आया है। लेखक ने पहले उदाहरणों से स्पष्ट किया कि जैसे सरदार पटेल की प्रतिमा में हर गाँव से लोहा मंगवाकर उसे सामूहिक योगदान का प्रतीक बनाया गया, वैसे ही राम […]
लेखक यहाँ यह बताना चाहता है कि प्राचीन ऋषियों ने अपने सूत्रों के माध्यम से ब्रह्मांड और पदार्थों के स्वरूप पर जिस प्रकार का चिंतन किया, वह केवल उस समय के लिए ही नहीं बल्कि आज की आधुनिक विज्ञान की खोजों से भी कहीं अधिक गहरा और व्यापक था। जब कोई बड़ी सभ्यता नष्ट हो […]
कि यह शिक्षा आपको सर्वांगीण विकास कराएगी। ये केवल कर्मकांड की शिक्षा नहीं है। हमारी जो शिक्षा केवल कर्मकांड की नहीं, केवल धार्मिक शिक्षा नहीं है, केवल जीवन के एक एक्सपेक्ट को लेकर के चलने वाली शिक्षा नहीं है, जीवन के हर आयाम को छूने वाली शिक्षा है। हमारे यहाँ पर गुरुकुल में 64 विद्याओं […]
लेखक यहाँ यह स्पष्ट करना चाहता है कि आज के समय में वास्तविक अर्ष भक्ति लुप्त होती जा रही है। अर्ष भक्ति का आशय यह है कि हमारी बुद्धि और शिक्षा का आधार केवल ऋषियों द्वारा रचित ग्रंथ ही हों, न कि इधर-उधर के दिखावे वाले या आडंबरपूर्ण विचार। स्वामी दयानंद जी ने स्वयं हजारों […]
यह पूरा वक्तव्य लेखक की उस दृष्टि को प्रकट करता है जिसमें गुरुकुल केवल पठन पाठन का केंद्र न होकर शोध और अनुसंधान का भी प्राणस्थान बन सके। लेखक यह स्पष्ट करता है कि गुरुकुल में शोध कार्य का मूल उद्देश्य वैदिक ग्रंथों, अर्ष ग्रंथों और प्राचीन शास्त्रों को सुव्यवस्थित रूप से आधुनिक काल के […]
यह पूरा वक्तव्य गुरुकुल की स्थापना, उसके उद्देश्य और भावी योजना का एक गहन चिंतन है जिसमें लेखक यह सिद्धांत प्रस्तुत करता है कि शिक्षा का मूल स्वरूप शुल्क या व्यापार नहीं बल्कि ब्राह्मण वृत्ति अर्थात ज्ञान की वृद्धि और दान की परंपरा है। वह कहता है कि गुरुकुल निशुल्क होना चाहिए, विद्यार्थी चाहे तो […]
यह पूरा भाषण सामवेद के ग्यारहवें मंत्र की गूढ़ व्याख्या है जिसमें वक्ता सबसे पहले ऋषि परंपरा और स्वामी दयानंद जी की चर्चा करते हैं कि वेदों की व्याख्या केवल बौद्धिक नहीं बल्कि समाधि की स्थिति में संभव है क्योंकि वहीं परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त होता है और वहीं से मंत्र का वास्तविक भाव प्रकट […]
इस कविता में वृक्ष के माध्यम से मनुष्य जीवन की तुलना करते हुए प्रेरणा दी गई है कि आंधी में भी अड़े रहो, पुष्पित और फलते रहो, जड़ों से जुड़े रहो, शाखाओं में विस्तार हो, वनलता बनकर लिपटे रहो, समर्पण में सिमटे रहो, दृढ़ और लचीला बनकर अस्तित्व बनाए रखो, फलवान और झुकते रहो, खग […]
प्रवचन में बताया गया कि कुछ वेद मंत्रों में योग विषय विशेष रूप से आया है और ऋषि दयानंद के अनुसार वेद सभी सत्य विद्याओं की पुस्तक हैं, स्वामी जी ने जब ऋग्वेद आदि भाष्यभूमि लिखा तो उसमें उस समय की सभी विद्या प्रदर्शित की गई, जिसमें योग विद्या भी शामिल है, योग विद्या संसार […]