VedicGurukul

विषय-सूची (अंक पृष्ठ-बोधक हैं)

अध्याय–1 : भौतिकी (Physics) | पृष्ठ 1–36
अग्निविद्या–1 | ऊर्जा अविनाशी एवं अमर है–1 | ऊर्जा का रूपान्तरण (Transformation of Energy)–1 | ऊर्जा पंजीभूत है–2 | गविष्टि एवं अश्वमिष्टि–2 | वैश्वानर अग्नि (Universal Energy)–2 | अग्नि का विराट् रूप (Universal Energy)–2 | ऊर्जा के विभिन्न नाम–2 | ऊर्जा व्यक्त-अव्यक्त, स्थूल-सूक्ष्म–3 | ऊर्जा सर्वव्यापक है (Energy Omnipresent)–3 | अग्नि में संप्रेषण शक्ति (Power of Transmission)–3 | अग्नि में विद्युत्-तरंगें (Electric Waves)–4 | विद्युत् में श्रवण शक्ति (Power of Hearing)–4 | अथर्वा (अर्थवन्) ऋषि : विश्व के प्रथम वैज्ञानिक–4 | अथर्वा द्वारा तीन आविष्कार–4 | अथर्वा ऋषि–4 | अग्नि का महत्त्व–4 | वृक्ष आदि से अग्नि का आविष्कार–5 | जल के मन्थन से अग्नि (Hydroelectric / Hydel)–5 | भूगर्भीय अग्नि (पुरीष्य अग्नि : Oil एवं Natural Gas)–5 | खानों में अग्नि–6 | समुद्री अग्नि–6 | दस प्रकार की अग्नियाँ–6 | आग्नेय ऊर्जा के अनन्त रूप–7 | अग्नि (ऊर्जा) के तीन रूप–7 | अग्नि का जन्म जल से–7 | अग्नि (ऊर्जा) के स्थान–8 | ऊर्जा विश्वव्यापी–8 | ऊर्जा हेतु विविध यन्त्र–8 | जल एवं अग्नि का चक्र (Circle of Water and Fire)–8 | अग्नि (ऊर्जा) विश्व का आधार–9 | ताप (Heat)–9 | अग्नि में विस्तारण की क्षमता (Power of Expansion)–9 | अग्नि (ताप) से पत्थर तोड़ना–9 | वज्र (Dynamite) द्वारा चट्टानें तोड़ना–9 | अग्नि परमाणुओं में गति देती है–10 | प्रत्येक परमाणु में अग्नि–10 | अग्नि के तीन तनु/शरीर–10 | अयःशया तनु (Terrestrial Energy)–10 | रजःशया तनु (Atmospheric Energy)–10 | हरिशया तनु (Solar Energy)–10 | अग्नि के विविध स्रोत (Sources of Energy)–11 | एक अग्नि के अनेक रूप–11 | विद्युत् (Electricity)–12 | मरुत् देवता (Electro-Magnetic Waves)–12 | सूर्य (Solar Energy)–12 | सूर्य संसार की आत्मा–12 | सूर्य अनेक हैं–13 | सूर्य में सोम (Hydrogen H₂ एवं Helium He)–13 | सूर्य के चारों ओर विशाल गैस–14 | सूर्य में धब्बे (Sun Spots)–14 | सूर्य की परिधि का दर्शन–14 | सात महासूर्य (Seven Solar Systems)–14

वेदों में विज्ञान | पृष्ठ 6–31

सात रंग की किरणें (7 Sun-rays)–14 | सूर्य की किरणें अतितीव्रगामी–14 | सूर्य की किरणों से विद्युत्-प्रवाह (Electro-magnetic Radiation)–14 | सूर्य की किरणें पदार्थों को वर्ण (रंग / Colour) देती हैं–15 | सूर्य में प्राण (Oxygen) एवं अपान (Hydrogen) शक्तियाँ–15 | सूर्य प्रदूषण-नाशक–15 | सूर्य वायुमंडल का शोधक–16 | सूर्य जीवन-रक्षक–16 | सूर्य चन्द्रमा को प्रकाश देता है–16 | सूर्य संसार का धारक एवं पालक–16 | सूर्य की किरणें पदार्थों को फैलाती हैं–16 | सूर्य और पृथिवी घूमते हैं (Rotate)–16 | सूर्य वर्षा का कारण है–16 |

सौर ऊर्जा (Solar Energy)–17 | सूर्य से ऊर्जा का दोहन–17 | सूर्य ऊर्जा का स्रोत है–17 | सूर्य से सात प्रकार की ऊर्जा प्राप्त करना–17 | सौर ऊर्जा के आविष्कारक वसिष्ठ एवं भरद्वाज ऋषि–18 | सूर्य में अक्षय धन–18 | सूर्य की घातक किरणें (Ultra-violet Rays)–18 |

सूर्य की सात रंग की किरणें–18 | मूल रंग तीन हैं–19 | विद्युत्-चुम्बकीय तरंगें (Electro-magnetic Waves)–19 | विद्युत्-चुम्बकीय स्पेक्ट्रम का क्रम–20 | दृश्य किरणें (Visible Light)–20 | विद्युत् और अशनि–20 | इन्द्रधनुष का निर्माण–21 | सूर्य एवं चन्द्र का परिवेष (घेरा) बनना–21 |

प्रकाश की गति (Velocity of Light)–21 | सूर्य न उदय होता है, न अस्त होता है–23 | सूर्य सात हैं–24 | सूर्य-रश्मियाँ हजारों हैं–24 | सूर्यग्रहण–24 | आकर्षण-शक्ति (Magnetism)–24 | सूर्य द्युलोक का धारक–24 | सूर्य पृथिवी को रोके हुए है–25 | आकर्षण-शक्ति से नक्षत्र स्थिर हैं–25 | परमाणुओं में आकर्षण-शक्ति–25 |

विविध–25 | द्रव्य एवं ऊर्जा का रूपान्तरण (Conservation of Mass and Energy)–25 | सोम (Hydrogen) का महत्त्व–26 | सूर्य-शक्ति का आधार सोम (Hydrogen)–26 | नक्षत्रों का आधार सोम–26 | पृथिवी की शक्ति का स्रोत सोम–26 | द्युलोक में सोम की महिमा–26 | अग्नि एवं सोम से विश्व की रचना–27 |

पृथिवी–27 | पृथिवी का केन्द्र-बिन्दु सूर्य (आकाश)–27 | पृथिवी की उत्पत्ति सूर्य से–27 | पृथिवी सूर्य की परिक्रमा करती है–28 | सूर्य के आकर्षण से पृथिवी रुकी है–28 | पृथिवी काँपते हुए चलती है–28 | पृथिवी पहले जलमग्न थी–28 | पृथिवी रत्नगर्भा–28 | पृथिवी की गति पश्चिम से पूर्व–28 |

गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त (Law of Gravitation)–29 | आधार-शक्ति–29 | आकृष्टि-शक्ति–29 | ज्वार-भाटा–30 | वायु (Atmosphere)–31 | वायु में प्राण-शक्ति–31

विषय-सूची | पृष्ठ 32–57

(Oxygen)–32 | वायु में नियुत् शक्ति (Nitrogen)–32 | मरुत्गण (Electro-magnetic Waves)–32 | मरुतों में चुम्बकीय शक्ति (Magnetic Power)–32 | मरुत् विद्युत्-चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करते हैं (Electro-magnetic Field)–33 | विद्युत्-चुम्बकीय क्षेत्र : ईशान कोण–33 | मरुत् सूर्य एवं पृथिवी के नियामक तथा आधार–33 | मरुतों का जन्म विद्युत् (Electricity) से–34 | मरुत् सदा गण (Group) रूप में चलते हैं–34 | मरुतों की संख्या–34 | मरुत् देवों को शक्ति देते हैं–34 | मरुत् वृष्टिकर्ता–34 | मरुतों की महान शक्ति–35 | मरुतों (Cosmic Rays) में रेणु (धूलि) नहीं–35 | एवयामरुत् (Electro-magnetic Waves)–35 | मरुत्गण में अपनी ज्योति–37 | विद्युत्-तरंगों (मरुतों) में चुम्बकत्व–37 | विद्युत्-तरंगें (मरुत) आत्मनिर्भर–37 | विद्युत्-तरंगों (मरुतों) की गति अतितीव्र–37 |

अध्याय–2 : रसायन-विज्ञान (Chemistry) | पृष्ठ 38–57

जल की उत्पत्ति–38 | जल का सूत्र–38 | मित्र-वरुण वृष्टिकर्ता–39 | जल का महत्त्व एवं गुण–40 | जल के भेद–41 | जल में सभी देव (तत्त्व)–41 | जल अखण्ड नहीं है–42 | जल का विराट् रूप–42 | जल से सृष्टि की उत्पत्ति–43 | जल से अग्नि (विद्युत्) की उत्पत्ति का आविष्कार–44 | सूर्य में जल (Hydrogen, H₂)–44 | सूर्य में उच्च जलतत्त्व (Helium, He)–45 | जल से सूर्य का जन्म–45 | द्यावा-पृथिवी में सोम (Hydrogen)–46 |

रसायन-विज्ञान की प्रमुख शाखाएँ–46 | भौतिक रसायन (Physical Chemistry)–46 | अकार्बनिक रसायन (Inorganic Chemistry)–47 | लोहे की कील–49 | धातुओं में टांका लगाना–49 | सूर्यकान्त मणि से अग्नि–49 | रत्नों की परीक्षा–50 | मोती : दस प्रकार–50 | मुक्ताभस्म बनाना–50 | पारद (पारा) की भस्म–50 |

कार्बनिक रसायन (Organic Chemistry)–51 | आसव–51 | सोम–51 | मधु–51 | रसायन बनाना–52 | सुरा–52 | सुरा-निर्माण विधि–52 | मासर–52 | नग्नहु–52 | लाक्षा–53 | चीड़ का लीसा (चीपुद्रु)–54 |

विविध–54 | आठ महारस–54 | क्षार के तीन प्रकार–54 | ताँबे से सोना बनाना–54 | चाँदी से सोना बनाना–55 | चाँदी शुद्ध करना–55 | मोती एवं रत्न गलाना–55 | पारा जमाना (Fixation of Mercury)–55 | किन धातुओं में जंग शीघ्र लगता है–55 | धातुओं को मारना–56 | अम्लराज (Aqua Regia)–56 | लोहे के तीन भेद–56 | अभ्रक आदि–57 | नकली सोना बनाना–57 | क्षार (Caustics) बनाना–57

वेदों में विज्ञान | अध्याय–3 : वनस्पतिशास्त्र (Botany) | पृष्ठ 58–82

वृक्ष-वनस्पतियों की उपयोगिता–58 | वृक्ष-वनस्पतियों का महत्त्व–60 | ओषधि का अर्थ–61 | ओषधियों के भेद–61 | ओषधियों का वर्गीकरण–62 | रंग के आधार पर–62 | स्वरूप / आकार-प्रकार के आधार पर–62 | गुणधर्म के आधार पर–62 | फल आदि के आधार पर–62 | ओषधियों के उत्पत्ति-स्थान–63 | वनस्पतिशास्त्र-विषयक अन्य विवरण–64 | पौधों का वर्गीकरण–64 | पौधों का नामकरण (Taxonomy)–65 | पौधों का विवरण–66 | वृक्षारोपण–68 | वृक्षों के लिए भूमि–68 | लगाने योग्य वृक्ष–68 | वृक्ष लगाना–69 | वृक्षों को सींचना–69 | वृक्षों का स्थानान्तरण–69 | वृक्ष लगाने का मुहूर्त–69 | कलम लगाना–69 | वृक्षों के रोग के कारण–70 | वृक्ष-चिकित्सा–70 | फल न लगने की चिकित्सा–70 | खाद–70 | वृक्षों में हरियाली का कारण : अवितत्त्व (Chlorophyll)–72 | वन एवं वृक्षों का संरक्षण–72 | वन एवं वृक्ष मानव के रक्षक–72 | वृक्ष-वनस्पतियाँ शिव के रूप–73 | वृक्ष-वनस्पतियों के लाभ–73 | वृक्ष-वनस्पतियों के उपकारक तत्त्व–75 | पृथिवी–75 | पर्जन्य (मेघ), जल एवं मरुत् (वायु)–76 | सोम (चन्द्रमा)–76 | सूर्य–76 | अग्नि–77 | वृक्षों पर कलम लगाना (Grafting)–77 | पौधों में लिंगभेद–78 | वृक्ष ऑक्सीजन (Oxygen) देते हैं–78 | अन्नों में प्राण एवं अपान तत्त्व–78 | वृक्षों की विविध मणियाँ–78 | वृक्षों में चेतनतत्त्व–79 |

अध्याय–4 : जन्तुविज्ञान (Zoology) | पृष्ठ 83–107

पशु का व्यापक रूप–83 | जीवों का वर्गीकरण–83 | पाँच प्रकार के पशु–84 | सात प्रकार के पशु–84 | अन्य विभाजन–84 | पशुओं का वैज्ञानिक वर्गीकरण–86 | जन्तुओं का पारिस्थितिक वर्गीकरण–88 | व्यावहारिक वर्गीकरण–89 | पशुधन का महत्त्व–89 | पशु-संरक्षण एवं पशु-संवर्धन–90 | पशुओं के गुण-कर्म एवं स्वभाव–90 | हंस का नीर-क्षीर विवेक–92 | पशु-पक्षियों का औषधिज्ञान–93 | पशु-पक्षियों का ऋतुज्ञान–93 | पशु-हिंसा निषेध–94 | पशुओं की उपयोगिता–95 | पशु-पक्षियों की अन्य विशेषताएँ–95 |

सुश्रुत में सर्प-वर्णन–99 | सर्प-विष-चिकित्सा–99 | जीव-जन्तुओं के विभिन्न वर्ग–100 | जलीय जन्तु–100 | सरीसृप (Reptiles)–100 | पक्षी–102 | स्तनधारी जन्तु (Mammals)–104 | वन्य / वनचर जन्तु–105 | कृमि एवं कीट–106 | कृमियों के नाम एवं रूप–107

विषय-सूची | अध्याय–5 : शिल्प-विज्ञान (Technology) | पृष्ठ 108–141

विविध शस्त्रास्त्र–108 | दिव्य अस्त्र–108 | अग्निपुराण में वर्णित शस्त्रास्त्र–110 | कौटिलीय अर्थशास्त्र में वर्णित शस्त्रास्त्र–110 | मानवीय अस्त्र-शस्त्र–111 | रासायनिक युद्ध एवं शत्रु-नाशन–114 |

वास्तुशास्त्र (Architecture)–115 | विशाल भवन–116 | लोह-निर्मित नगर–116 | वातानुकूलित भवन–117 | शालानिर्माण–117 | कभी न छूटने वाला प्लास्टर–120 | वज्रलेप–120 | प्रासाद–121 | प्रासाद और विमान–121 | बारह मंज़िले भवन–122 | 41 प्रकार के भवन–122 | नगर-निवेश (Town-Planning)–122 | मार्ग-विनिवेश (सड़कें)–122 | भवन एवं देव-मन्दिर–123 |

वेदों में विमान एवं अन्तरिक्ष-यात्रा–123 | वेदों में “विमान” शब्द–123 | अन्तरिक्ष-यात्रा–124 | विमान की रचना–124 | स्वचालित यान (विमान)–125 | अन्तरिक्ष एवं समुद्र में चलने वाला यान–126 | पृथिवी एवं आकाश में चलने वाला यान–126 | विमान में सुरक्षा के साधन–126 | मधुवाहन रथ–126 | पक्षिवत् उड़ने वाला यान–126 | मनोवेग यान (विमान)–127 | तीन-अंग वाला विमान–127 | विमान-निर्माता ऋभु-देव–127 | आकाश एवं समुद्र में चलने वाला रथ (विमान)–127 | विमान में इंजन एवं तेल–128 | विमान से रक्षाकार्य–128 | विशाल समुद्री जहाज़–129 | समुद्र के भीतर चलने वाला जहाज़–129 |

विमानशास्त्र की संक्षिप्त रूपरेखा–129 | विमान का अर्थ–131 | विमान-चालक–132 | आकाशीय मार्ग–132 | आकाशीय आवर्त (भँवर)–132 | सौर ऊर्जा से विमान-चालन–132 | शिरः-कीलक यन्त्र–132 | विमानों के भेद–133 | राजलोह से विमान-रचना–133 | विमान के 28 अंग–133 | विमान की 12 गतियाँ–133 | विमान के 32 यन्त्र–133 | विमान में पारद का प्रयोग–133 | शक्त्याकर्षण यन्त्र–134 | विमान में 103 मणियों का प्रयोग–134 | भू-जल-अन्तरिक्षगामी विमान–134 | सौर ऊर्जा से संचालन–134 | त्रिपुर-विमान की रचना–134 | शुद्ध अभ्रक का प्रयोग–134 | विविध यन्त्र–134 |

विविध शिल्प एवं उद्योग–135 | शिल्प का महत्त्व–135 | शिल्प एवं यन्त्र–135 | विविध उद्योग–136 | वस्त्र-उद्योग–136 | गृह-उद्योग एवं विविध शिल्प–137 | अन्य विशेष उल्लेखनीय व्यवसाय–140

अध्याय–6 : कृषिविज्ञान (Agricultural Sciences) | पृष्ठ 142–161

कृषि का महत्त्व–142 | कृषि का प्रारम्भ–143 | राजा पृथी (पृथु) : कृषि के आविष्कारक–143 | सर्वप्रथम कृषिकर्ता इन्द्र एवं मरुत्–143 | कृषिकर्म–144 | कृषि, हल एवं बैल–145 | भूमि के भेद–147 | बीज, भूमि एवं वर्षा–147 | बीज बोना–147 | कौटिल्य एवं कृषि–148 | कृषि एवं यज्ञ–149 | धूम, अभ्र एवं मेघ–150 | कृषि हेतु आवश्यक पदार्थ–151 | उर्वरा भूमि–151 | उत्तम बीज–151 | धूप–151 | वायु–151 | जल एवं वर्षा–152 | खाद–153 | सुरक्षा एवं कृमिनाशन–153 | कृषिनाशक तत्त्व–154 | कृषि के साधन–155 | सिंचाई के साधन–155 | अन्न के दो प्रकार–156 | सस्य / फसलें–156 | उर्वरक–156 | अन्नों के नाम–156 |

पशुपालन-विज्ञान–157 | पशु-संवर्धन–158 | गो-महिमा–159 | पशु-हत्या निषेध–159 | पशु-संपदा की उपयोगिता–160 | कौटिल्य एवं पशुपालन–160 | गो-हत्या पर मृत्युदण्ड–160 | पशुओं का भोजन–161 |



अध्याय–7 : गणितशास्त्र (Mathematics) | पृष्ठ 162–205

गणित का महत्त्व–162 | गणितशास्त्र का उद्भव–163 | अंकगणित / पाटीगणित–164 | अंकगणित के विषय–165 | मूलभूत परिकर्म (दो)–165 | संख्यावाचक शब्द–165 | संख्याओं का स्थानिक मान (Notational Places)–166 | संख्यावाचक शब्दों का आधार : 10 संख्या–167 | संख्याशब्द : समस्त एवं असमस्त–167 | संख्याशब्दों का विभिन्न प्रकार से उल्लेख–168 | दश (10) के लिए “ति” प्रत्यय–169 | 9 अंकों के लिए आरोह-अवरोह क्रम–169 | दशम-पद्धति का उल्लेख–171 | संख्याशब्द एवं संख्याओं का निर्माण–171 | संख्या (Cardinals) एवं संख्येय (Ordinal Numbers)–172 | संख्याबोधक अन्य शब्द–173 | पारिभाषिक शब्द–174 | शब्दांक-प्रणाली–175 |

दशमलव स्थानमान एवं शब्दांक-प्रणाली के दो प्रकार–176 | आर्यभटीय पद्धति–176 | कटपयादि पद्धति–177 | अंकों हेतु प्रयुक्त संकेत-शब्द–178 |

आठ परिकर्म (Fundamental Operations)–179 | संकलन / जोड़ (Addition)–179 | व्यवकलन / घटाना (Subtraction)–180 | गुणन (Multiplication)–182 | यजुर्वेद के दो महत्त्वपूर्ण मंत्र–184 | भाग / भागहार (Division)–185 | भिन्न-परिकर्म (Fractions)–186 | वर्ग एवं वर्गमूल (Square, Square-root)–188

विषय-सूची | पृष्ठ 189–226

शून्य (Zero) का महत्त्व–189 | शून्य का मान–190 | दशमलव-स्थानमान-पद्धति–190 | परार्ध एवं अवरार्ध–192 | शून्य का अभिप्राय–192 | शून्य का स्वरूप–193 | शून्य एवं अनन्त–194 | वेद में दशमलव पद्धति का संकेत–194 | अंकों का लेखन–196 |

बीजगणित (Algebra)–198 | ज्यामिति / रेखागणित (Geometry)–198 | यज्ञवेदी एवं रेखागणित–200 | वेदियों के नाम, आकार एवं परिमाण–201 | महावेदी–201 | परिधि, व्यास एवं पाई का मान (Circumference, Diameter, Value of Pi)–203 | कर्ण (Hypotenuse) निकालना : पाइथागोरस प्रमेय–204 |

अध्याय–8 : ज्योतिष (Astronomy) | पृष्ठ 206–226

ज्योतिष का महत्त्व–206 | काल का महत्त्व–206 | लगध का वेदांग-ज्योतिष–207 | ज्योतिष-विषयक प्रमुख तथ्य–208 | ज्योतिष एक विज्ञान–208 | सृष्टि (युग) का काल-निर्धारण–208 | सूर्य संसार की आत्मा–209 | सात सौरमंडल–209 | सूर्य अनेक हैं–209 | सूर्य के आकर्षण से पृथिवी स्थिर–209 | सूर्य एवं पृथिवी में आकर्षण-शक्ति–209 | पृथिवी सूर्य की प्रदक्षिणा करती है–210 | सूर्य एवं समस्त संसार घूमता है–210 | अहोरात्र चक्र निरन्तर गतिमान–211 | सूर्य से चन्द्रमा को प्रकाश–211 | सूर्य न उदय होता है, न अस्त–211 | सूर्य संसार का धारक–212 | सूर्य के कारण दिन-रात्रि–212 | अहोरात्र में 30 मुहूर्त–212 | एक मास में 30 अहोरात्र–212 | एक वर्ष में 12 मास–212 | एक वर्ष में 720 अहोरात्र–212 | वर्ष का आधार : मास–212 | वर्ष-गणना का प्रारम्भ रात्रि से–212 | विषुवत् रेखा–213 | उत्तरायण एवं दक्षिणायन–213 | संवत्सर एवं नक्षत्र–214 | बारह राशियाँ–214 | नक्षत्रों के नाम एवं देवता–214 | नक्षत्रों के स्थान–215 | नक्षत्र एवं मासों के नाम–216 | ग्रहों के नाम–216 | तिथियों के नाम–217 |

वर्षचक्र एवं कालमान (Measures of Time)–218 | कौटिल्य-सम्मत कालमान–218 | ऋतु एवं मास–219 | अधिमास / मलमास–219 | सावन : दिन-मास-वर्ष–219 | मास-गणना के विविध प्रकार–220 | कौटिल्य एवं मास के प्रकार–221 | मास-गणना के दो प्रकार–222 | मासों एवं अर्धमासों के नाम–224 | शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्ष : दिन-रात्रि के नाम–224 | तिथि-नाम–225 | दिन के विभाग–225 | मुहूर्तों के नाम–225 | शुक्लपक्ष के 15 दिन–225

विषय-सूची
अध्याय ९ – वृष्टिविज्ञान (Meteorology) २२७-२५१
मेघ (बादल) कैसे बनते हैं? २२७, मनु का मत २२८, जल में अग्नि २२९, मेघ की रचना और वृष्टि २३०, मेघ के सहायक तत्त्व २३१, शतपथ ब्राह्मण और उपनिषदें २३१, मेघ और वायु का युग्म २३२, सूर्य और वर्षा का सम्बन्ध २३३, वायु के ६ भेद २३३, सात प्रकार के बादल २३३, मेघ एवं वर्षा के अनेक रूप २३३, अतिवृष्टि को रोकना २३४, कारीरी इष्टि या वर्षकाम इष्टि (वर्षा के लिए यज्ञ) २३४, वृष्टि के लिए आवश्यक तत्त्व २३६, मरुत्गण वर्षा के कारण २३६, मित्र और वरुण वृष्टिकर्ता २३८, सूर्य और अग्नि वर्षा के कारण २३८, ऋतुभेद से मेघ के भेद २३९, समुद्र का महत्त्व २३९, पृथिवी को शक्ति देने वाले तीन पदार्थ (सूर्य, वायु, पर्जन्य) २४०, बादलों के घर्षण से विद्युत् २४०, वृक्ष वर्षा में सहायक २४०, इन्द्रधनुष की रचना २४०, वर्षा के लाभ २४०, यज्ञ से कृत्रिम वर्षा कराना २४१, मेघों का निर्माण (गर्भाधान, पुष्टि और प्रसव) २४१, वृष्टिविज्ञान-विषयक विवेचन २४२, मेघों के गर्भाधान का समय २४३, गर्भस्थापन-मास, पक्ष और प्रसव-मास, पक्ष २४४, मेघ-भ्रूण का परिपाक २४४, मेघ-भ्रूण-परिपाक में विघ्न २४५, उपलवृष्टि (ओला गिरना) २४५, वायु का महत्त्व, वायु का विवेचन २४५, मेघ और वर्षा २४६, वर्ष-प्रमाण (वर्षा का जल नापना, Rain-gauge) २४८, शीघ्र वर्षा के लक्षण २४८, ओला, तुषार, हिम आदि २५०, उल्का (Meteor) के पाँच भेद २५१, इन्द्रधनुष (Rainbow) की रचना २५१, परिवेष, परिधि (सूर्य-चन्द्र के चारों ओर घेरा) २५१

अध्याय १० – पर्यावरण (Environment, Ecology) २५२-२८२
पर्यावरण और वैज्ञानिक चिन्तन २५२, पर्यावरण का अर्थ २५२, पर्यावरण-प्रदूषण २५२, वायु-प्रदूषण २५३, वायु प्रदूषण के कारण २५३, वायु-प्रदूषण का प्रभाव २५३, वायु-प्रदूषण नियंत्रण के उपाय २५५, जल-प्रदूषण २५६, जल-प्रदूषण के प्रमुख कारण २५६, जल-प्रदूषण का प्रभाव २५६, भूमि प्रदूषण २५७, ध्वनि-प्रदूषण २५८, ध्वनि प्रदूषण से होने वाली बीमारियाँ २५८

विषय-सूची
ध्वनि-प्रदूषण के नियंत्रण के उपाय २५८, रेडियोधर्मी प्रदूषण २५८, रेडियोधर्मी-प्रदूषण के नियंत्रण के उपाय २५८, पर्यावरण और वैदिक चिन्तन २५९, पर्यावरण के संघटक तत्त्व २५९, पर्यावरण-प्रदूषण २५९, वायु-संरक्षण २५९, वायु का महत्त्व २५९, वायु में अमृत २६०, वायु-प्रदूषण को रोकें २६०, पर्यावरण-शोधक २६०, पर्यावरण की शुद्धि का महत्त्व २६१, ओजोन परत (Ozone-layer) २६१, द्यावापृथिवी (द्यु, भू) का संरक्षण २६२, धु-भू माता-पिता २६३, पृथिवी को क्षति न पहुँचावें २६५, जल-संरक्षण २६६, जल की उपयोगिता २६६, समुद्र और नदियाँ २६८, जल और वनस्पतियाँ मानव के रक्षक २६८, जल को प्रदूषण से बचावें २६८, पुराणों आदि में प्रदूषण-निवारण २६९, वृक्ष-वनस्पति-संरक्षण २६९, वृक्ष-वनस्पतियों का महत्त्व २६९, ब्राह्मण-ग्रन्थों में वृक्ष-वनस्पति २७०, वृक्ष शिव के रूप हैं २७१, वृक्षों से लाभ २७२, वृक्षों को लगावें २७२, वृक्ष-काटना दंडनीय अपराध २७२, प्रदूषण-रोधक वृक्ष-वनस्पतियाँ २७२, यज्ञ प्रदूषण – समस्या का सर्वोत्तम समाधान २७४, यज्ञ का महत्त्व २७४, ब्राह्मण ग्रन्थों में यज्ञ का महत्त्व २७५, यज्ञ में प्रयुक्त द्रव्य २७६, भैषज्य यज्ञ २७९, अग्नि प्रदूषण-निवारक २७९, सूर्य प्रदूषण-नाशक २८०, ध्वनि-प्रदूषण-निवारक शब्दशक्ति (Sound-waves) २८१, ध्वनिप्रदूषण के नियन्त्रण के उपाय २८१, पर्वत प्रदूषण-नाशक २८२

अध्याय ११ – भूगर्भ-विज्ञान (Geology) २८३-२९४
पृथिवी की सात परतें (Strata) २८३, पृथिवी की तीन परतें ठोस २८३, तीन परतों के ६ खंड २८३, पृथिवी के केन्द्र में अग्नि २८३, भूगर्भ और Radioactivity (तडित्-रेणुविकिरण शक्ति) २८५, पृथिवी में प्राकृतिक गैस (Gas) २८७, भूगर्भीय गैस का आविष्कारक अथर्वा ऋषि २८७, पुरीष्य अग्नि जल में भी २८७, समुद्र में भी गैस २८८, पृथिवी में अग्नि के कारण गति और कंपन २८८, पृथिवी के अन्दर भी शिराएँ (Veins) २८८, पृथिवी के अन्दर मित्र-वरुण शक्तियाँ २८९, समुद्र में विविध ओषधियाँ २८९, कोयले आदि की खान (Mine) २९०, पृथिवी में धातु और खनिज २९०, भूगर्भ में रत्न आदि २९०, समुद्र में खजाना २९१, सिन्धु नदी में सोना २९२, समुद्र में वनस्पतियाँ और अन्न २९२, पर्वतों में भी धन २९२, जन-स्रोतों का पता लगाना २९२, वराहमिहिर और जलस्रोत ज्ञान २९३

निर्देशिका (Index) २९५-३०४