शिक्षा का उद्देश्य
जैसा कि पहले ही संकेत किया जा चुका है, उस समय शिक्षा को अपने-आप में लक्ष्य नहीं माना जाता था, अपितु केवल एक साधन – ब्रह्मवर्चस् अर्थात् पवित्र ज्ञान या परम तत्त्व-ज्ञान की प्राप्ति – की ओर ले जाने वाला मार्ग समझा जाता था। वैदिक साहित्य में विभिन्न स्थलों पर इस बात का उल्लेख मिलता है।
यज्ञ और अध्ययन का महत्त्व
यद्यपि यज्ञ एवं विशिष्ट अनुष्ठान भी आध्यात्मिक उन्नति के साधन माने गए, तथापि पवित्र ग्रन्थों के अध्ययन पर अधिक बल दिया गया। इस अध्ययन के लिए स्वाध्याय शब्द का प्रयोग हुआ है।
शतपथ ब्राह्मण में स्वाध्याय को ब्रह्मयज्ञ कहा गया है, जिसके द्वारा अविनाशी लोक की प्राप्ति होती है।
स्वाध्याय से मन की प्रसादता, स्वावलम्बन, आत्म-चिकित्सा-शक्ति, इन्द्रिय-संयम, समचित्तता, बुद्धि-वृद्धि, यश तथा जन-कल्याण हेतु सामर्थ्य की प्राप्ति होती है।
तैत्तिरीय आरण्यक के निर्देश
तैत्तिरीय आरण्यक में स्वाध्याय को ब्रह्मयज्ञ मानकर उसके स्थान तथा समय का उल्लेख है—
नगर अथवा ग्राम से उत्तर या ईशान दिशा में बाहर जाकर, जहाँ मकान की छतें दिखाई न दें, सूर्योदय के पश्चात् बैठकर वेदों तथा ब्राह्मण, इतिहास, कल्प, गाथा, नाराशंस आदि का जप-अध्ययन करना चाहिए।
कठिन परिस्थितियों में अध्ययन
संकट-काल में नगर या ग्राम में भी रात्रि-दिवस अनुकूल समय पर स्वाध्याय किया जा सकता है, परन्तु ऊँची आवाज़ में नहीं। गृह लौटते समय दान करना चाहिए।
स्वाध्याय के लिए गुरु की उपस्थिति अनिवार्य नहीं, परन्तु अपवित्र अवस्था में अध्ययन वर्जित है।
अन्य नियम
ऐतरेय आरण्यक में कुछ विशेष समयों के निषेध का उल्लेख है—
जैसे पौष-पूर्णिमा के पश्चात् जल-शोषण-काल, दोपहर-छाया-संगम, गहन मेघ, अघोषित वर्षा आदि।
अथर्ववेद में वर्जित स्थल—मेघयुक्त आकाश, आँधी-तूफ़ान, वृक्ष-छाया, हरित-क्षेत्र, एवं पशुओं के कोलाहल के समीप।
आचार्य की आवश्यकता
स्वाध्याय आवश्यक होने पर भी गुरु की आवश्यकता का निषेध नहीं था। आत्म-अध्ययन की निष्फलता सर्वत्र मान्य है।
कठ-उपनिषद कहती है—“गुरु के बिना यहाँ मार्ग नहीं है।”
मुंडक-उपनिषद—“ज्ञान की प्राप्ति हेतु ईंधन-समेत गुरु के पास जाओ।”
अर्थात् आत्मा की प्राप्ति न केवल स्वाध्याय, न मानसिक सामर्थ्य, न संग्रहित सूचना से संभव है। गुरु अनुभव-जनित अज्ञान-बंधन को दूर करता है।
छान्दोग्य-उपनिषद की दृष्टान्त-कथा
जिस प्रकार गांधार-देश से आँखों पर पट्टी बाँधकर लाए गए व्यक्ति की दृष्टि खोलकर उसे दिशा बताई जाए, तो वह मार्ग पूछता-पूछता घर पहुँच जाता है उसी प्रकार गुरु से प्राप्त ज्ञान जीव को संसार-बंधन से मुक्त कर मोक्ष-पथ पर ले जाता है।
गोपनीयता एवं उपदेश-नियम
पुरातन उपनिषदों में उल्लेख है कि शिक्षा-संस्कार (उपनयन) के बिना, अथवा योग्य शिष्य के अभाव में, रहस्य-ज्ञान किसी को नहीं दिया जाना चाहिए।
विशेष उपदेश-निषेध
- ऐतरेय आरण्यक में कहा गया है कि अक्षरों के रहस्य को उस शिष्य को ही बताओ जो एक वर्ष तक अध्ययन कर चुका हो और गुरु बनने को तत्पर हो।
- छान्दोग्य उपनिषद में उपदेश केवल ज्येष्ठ पुत्र या योग्य शिष्य को देने का विधान है।
- बृहदारण्यक में मिश्र-पान-सम्बन्धी विधि केवल पुत्र या शिष्य को दी जा सकती है।
- श्वेताश्वतर तथा मैत्रायणी-उपनिषद में असंयमी व्यक्ति को यह रहस्य-ज्ञान देना निषिद्ध है।
शिष्य-धर्म एवं देवताओं का आदर्श
उपनिषदों में देव एवं मनुष्य—दोनों—गुरु-सेवा का पालन करते दिखते हैं।
छान्दोग्य में इन्द्र ने प्रजापति के यहाँ 101 वर्ष तक शिष्य-रूप में निवास किया।
कौषीतकि में अरुणि ने चित्र गांग्यायन के पास शिष्य-धर्म स्वीकार किया।
बृहदारण्यक व प्रश्न-उपनिषद में विभिन्न ऋषियों द्वारा गुरु-शरण-ग्रहण के उदाहरण मिलते हैं।
औपचारिक शिष्यत्व के बिना उपदेश
प्रारम्भिक काल में शिष्यत्व का अनिवार्य न होना
प्रमाणों से प्रतीत होता है कि प्रारम्भिक वैदिक युग में औपचारिक शिष्यत्व पूर्णतः अनिवार्य नहीं था। चार आश्रमों का कर्तव्यरूप विभाजन अपेक्षाकृत बाद की व्यवस्था है।
छान्दोग्य में कहा गया है—“जो ज्ञान गुरु से प्राप्त होता है, वह निश्चित रूप से लक्ष्य-प्राप्ति तक ले जाता है।”
अनुपनीय उपदेश के उदाहरण
एक स्थले वर्णित है कि राजा अश्वपति ने छह ब्राह्मणों को हाथ में समिधा लिए उपस्थित होने पर बिना उपनयन (अनुपनीय) किए, तथा बिना किसी पूर्व संस्कार की अपेक्षा के ही उपदेश दिया।
एक अन्य स्थले [vi, 1, 1] कहा गया है—
उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु से कहा—
“श्वेतकेतु! विद्याध्ययन करो; क्योंकि हमारे वंश में कोई भी ऐसा नहीं होना चाहिए जो केवल जन्म से ब्राह्मण हो, किन्तु अध्ययन-रहित।”
इससे अनुमान किया जा सकता है कि उस काल में ब्रह्मचर्य-प्रवेश प्रशंसनीय तो था, पर सभी ब्राह्मणों पर सार्वभौम रूप से अनिवार्य नहीं हुआ था। इसी प्रकार सत्यकाम का ब्रह्मचर्य-प्रवेश भी स्पष्टतः उनकी स्वेच्छा पर आधारित जान पड़ता है।
औपचारिक शिष्यत्व के बिना उपदेश के उदाहरण
बृहदारण्यक में—याज्ञवल्क्य ने न केवल अपनी पत्नी मैत्रेयी को, बल्कि जनक को भी उपदेश दिया, यद्यपि वे उनके औपचारिक शिष्य नहीं थे।
गर्गी के साथ संवाद द्वारा उन्होंने अनेक श्रोताओं की उपस्थिति में गूढ़ प्रश्नों का निराकरण किया।
केवल आत्मा के गमनागमन के रहस्य को आर्तभाग के समक्ष गुप्त रूप से समझाने के लिए उन्होंने एकांत ग्रहण किया।
पिता का आचार्य-स्वरूप
उपरोक्त प्रमाण दर्शाते हैं कि पिता द्वारा भी शिक्षा-प्रदान संभव एवं मान्य था।
श्वेतकेतु ने अपने पिता से तथा अन्य आचार्यों से—दोनों प्रकार से शिक्षा प्राप्त की।
शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख है कि एक ब्राह्मण को अपने पुत्र को अध्ययन एवं यज्ञ-विधि दोनों में प्रशिक्षित करना चाहिए।
वाम्श-ब्राह्मण भी इसका समर्थन करता है। यद्यपि प्रसिद्ध आचार्य के पास अध्ययन कराना भी प्रचलित था।
ब्रह्मचर्य-दीक्षा : उपनयन-विधि
सामान्यतः छात्रत्व का आरम्भ उपनयन–संस्कार द्वारा होता था।
अथर्ववेद इस संस्कार की आध्यात्मिक महत्ता बताता है।
शतपथ में कहा गया गुरु शिष्य के सिर पर दक्षिण–हस्त रखकर मानो उसे गर्भ में धारण करता है।
तृतीय रात्रि में सावित्री–उपदेश द्वारा शिष्य वास्तविक ब्राह्मणत्व प्राप्त करता है।
अतः छात्र गुरु-मुख से पुनर्जन्म-धारण करता है।
दीक्षा-प्रार्थना और औपचारिक वचन
बृहदारण्यक में निर्देश है कि शिष्य को उद्देशित वचनों के साथ प्रार्थना करनी चाहिए “उपैमि अहं भवन्तम्।”
शतपथ में“मैं ब्रह्मचर्य का आरम्भ करूँ।” “मैं ब्रह्मचारी बनूँ।”
—ऐसे वचनों का उच्चारण अनिवार्य था।
समिधा धारण करना गुरु-सेवा तथा पवित्रीकृत अग्नि-धारण की तत्परता का चिह्न था।
गुरु द्वारा जिज्ञासा एवं चयन
दीक्षा से पूर्व आचार्य शिष्य की जाति एवं कुल-परंपरा के विषय में पूछताछ करते थे।
सत्यकाम जाबाल का प्रसंग प्रसिद्ध है गौतम ने उनसे कुल-नाम पूछा, परन्तु अनिश्चित वंशावली भी बाधक न बनी।
शतपथ में भी केवल नाम पूछकर शिष्य-स्वीकृति का उल्लेख है।
इससे निष्कर्ष निकलता है कि प्रारम्भिक काल में योग्यता एवं सत्यनिष्ठा, कुल-प्रतिष्ठा से अधिक महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी।
ब्रह्मचर्य-कालावधि
अध्ययन-अवधि का सामान्य नियमन
छात्रत्व की अवधि सामान्यतः बारह वर्ष निश्चित मानी जाती थी। श्वेतकेतु बारह वर्ष अपने आचार्य के साथ निवास करने के पश्चात् गृह लौटे। उपकोसल कामलायन भी सत्यकाम जाबाल के आश्रम में बारह वर्ष तक ब्रह्मचारी रूप में रहकर अग्नियों की सेवा करते रहे।
दीर्घतर अवधि के उदाहरण
कई स्थलों में बारह वर्ष से अधिक अध्ययन की दीर्घ अवधि का उल्लेख है जैसे—सत्यकाम जाबाल ने अनेक वर्षों तक अध्ययन किया, और उस समय चार सौ गौये बढ़कर एक सहस्र हुईं।
ऐतरेय ब्राह्मण में एक छात्र नाभान्निदिष्ठ का उल्लेख है जो इतने दीर्घ काल तक गुरु के पास रहा कि उसके पिता ने उसे मृत कल्पित कर अपना धन अन्य पुत्रों में बाँट दिया।
अत्यन्त दीर्घ काल
छान्दोग्य में 32 वर्षों का छात्रत्व भी उल्लेखित है। और 101 वर्षों का भी उल्लेख प्राप्त होता है।
अध्ययन-आरम्भ का आयु-निर्देश
श्वेतकेतु के प्रसंग से ज्ञात होता है कि उन्होंने बारह वर्ष की आयु में गुरु-गृह में प्रवेश किया।
छात्रत्व के बाह्य नियम एवं कर्तव्य
गुरु-गृह में निवास
छात्र के लिए प्रथम अनिवार्य शर्त यह थी कि वह अपने आचार्य के गृह में रहता था।
अथर्ववेद, शतपथ ब्राह्मण, ऐतरेय तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण सभी में इस नियम का उल्लेख मिलता है।
छान्दोग्य में छात्र को आचार्यकुल–वासिन् और अन्तेवासिन् इन उपाधियों से विभूषित किया गया है।
भिक्षाटन-व्रत
ब्रह्मचारी का सामान्य नियम यह था कि वह अपने आचार्य के लिए भिक्षा लाए।
छान्दोग्य में वर्णन है कि गृहस्थों सौनक कापेय और अभिप्रतातिरीन काक्षसेन जब भोजन कर रहे थे, तभी एक धार्मिक छात्र ने उनके पास भिक्षा माँगी। शतपथ तथा अथर्ववेद दोनों में भिक्षाटन का उल्लेख विनय, नम्रता और लज्जा-त्याग हेतु विशेष साधन रूप में किया गया है।
शतपथ में स्पष्ट रूप से “अपने को दरिद्र बनाकर और लज्जा का त्याग कर वह भिक्षा माँगता है।”
अग्नि-सेवा
एक अन्य प्रमुख कर्तव्य पवित्र अग्नियों की सेवा और उनको प्रज्वलित रखना।
उपकोसल ने बारह वर्षों तक अग्नि-सेवा की और फिर भी गुरु ने उन्हें ज्ञान देने के स्थान पर यात्रा कर ली।
शतपथ में अग्नि-धान के आध्यात्मिक पक्ष का भी उल्लेख है—
समिधा रखने का अर्थ “मन को पवित्र तेजोमय अग्नि से प्रज्वलित करना।”
सार
इस प्रकार ब्रह्मचर्य दीर्घकालीन अध्ययन, गुरु-गृह निवास, विनम्र जीवन, भिक्षाटन, अग्नि-सेवा
—आदि कठोर तपस्यात्मक अनुशासनों के अधीन था।
ब्रह्मचारी के कर्तव्य और शिक्षण
ब्रह्मचारी का एक मुख्य कर्तव्य आचार्य के गृह तथा गोवर्ग की सेवा एवं रक्षण था। शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख मिलता है कि विद्यार्थी अपने आचार्य, उनके भवन और उनकी गौओँ की रक्षा करते थे। छान्दोग्य उपनिषद में सत्यकाम का वृत्तान्त है, जो दीर्घ काल तक आचार्य की गौओँ को लेकर दूर देश में रहा, और जिनकी संख्या चार सौ से बढ़कर एक सहस्र हो गयी। इसी प्रकार सांखायन आरण्यक तथा ऐतरेय आरण्यक में भी ब्रह्मचारियों द्वारा दीर्घ काल तक गौ-रक्षण का निर्देश प्राप्त होता है।
ब्रह्मचारी का त्याग-भाव इससे भी स्पष्ट होता है, जब उसका पारिवारिक धन-वैभव भाइयों में विभाजित हो जाता है और वह स्वयं आचार्य के समीप रहकर वेदाध्ययन में रत रहता है।
ब्रह्मचारी को दिन में निद्रा निषिद्ध थी। उत्सव-समारोहों में आचार्य के साथ रहते हुए वह आज्ञा की प्रतीक्षा करता था। राजा जनक के यज्ञ में, जहाँ सहस्र गौएँ सु-वर्णयुक्त सींगों के साथ पुरस्कृत की गयीं, याज्ञवल्क्य ने अपने शिष्यों को उन्हें हाँक ले जाने की आज्ञा दी—जिससे शिष्य-सेवा का स्वरूप स्पष्ट होता है।
अध्ययन-विधि
गुरु-सेवा के कार्यों से शेष समय में (गुरोः कर्मातिशेषेण) विद्यार्थी वेदाध्ययन करता। अल्प आयु में ही प्रवेश होने से प्रारम्भिक शिक्षा का विषय स्वरों और वर्णों का यथार्थ उच्चारण था—जिसमें छन्द, व्याकरण तथा ध्वनि-शास्त्र का प्राथमिक ज्ञान भी सम्मिलित था।
तैत्तिरीय प्रातिशाख्य में छात्र से अपेक्षा की गयी है कि वह वर्णोच्चार में प्रयत्न की मात्राएँ (गुरु, लघु, सम), वर्णों की दीर्घता (ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत), लोप, आगम, विकार, स्वरों के भेद (उदात्त, अनुदात्त, स्वरित), श्वास-बल तथा वर्ण-स्थानों
का ज्ञान रखे। साथ ही पद-पाठ तथा वर्ण-पाठ का भी विशेष ज्ञान आवश्यक था।
नियम और अनुशासन
ऐतरेय आरण्यक में शिक्षण के समय अनेक नियम कहे गये हैं गुरु और शिष्य दोनों भूमि पर बैठें; शिष्य न तो झुककर, न पीछे टिककर अध्ययन करे; अधिक वस्त्र, आभूषण, सुगंध, तेल, या स्नान के पश्चात अध्ययन वर्जित था। रक्त-दर्शन, मृत-शरीर-स्पर्श, माँसाहार, लेखन आदि के पश्चात भी शिक्षा निषिद्ध थी। ये बाह्य नियम आन्तरिक शुद्धि और संयम के लिए थे।
अन्तरंग साधना
उपनिषद्-विद्या ग्रहण करने से पूर्व ब्रह्मचारी में शान्ति (शान्त), इन्द्रियनिग्रह (दन्त), उपरति (त्याग), धैर्य (तितिक्षा), एकाग्रता (समाहितता) का विकास अपेक्षित था।
गोपथ ब्राह्मण में रूपक के माध्यम से ब्रह्मचारी को घमण्ड, क्रोध, निद्रा, अभिमान, स्त्री-आसक्ति आदि वासनाओं पर विजय पाने का उपदेश मिलता है।
शुद्ध आहार, सदाचार और शिरोव्रत (मुण्डन अथवा अग्नि-भार-धारण) उसकी तैयारी का अंतिम चिह्न था—जिससे ब्रह्मविद्या-प्राप्ति के योग्यत्व का संकेत मिलता है।
परम-विद्या की उपलब्धि
ब्रह्मविद्या की प्राप्ति, स्वाभाविक है, केवल अल्प-अवधि के शिक्षण से नहीं, वरन् सम्पूर्ण जीवन के समर्पण से सिद्ध होती थी। श्वेतकेतु का उदाहरण प्रसिद्ध है—जो बारह वर्ष की गुरुकुल-सेवा पूर्ण कर घर लौटे, परन्तु गर्व से भरित होकर स्वयं को विद्वान् समझते थे, किन्तु ब्रह्मज्ञान से रहित थे। यह स्पष्ट है कि ऐसे विद्यार्थी, जिनमें दीर्घ साधना के उपरान्त भी आवश्यक पात्रता न उपजी, उन्हें उच्चतम विद्योपदेश के योग्य नहीं माना जाता था। इसी प्रकार उपकोशल कामलायन भी दीर्घकालीन तपस्वी विद्यार्थित्व के पश्चात् भी गुरु द्वारा उपदेश-प्राप्ति के अधिकारी न समझे गये।
यह मानना समीचीन है कि शान्ति, दमन, उपरति आदि गुण—जो ब्रह्मविद्या के अनिवार्य पूर्वाधार माने गये—प्रारम्भिक अवस्था के नहीं, वरन् दीर्घ तप और संघर्ष के बाद परिपक्व जीवन की उपलब्धि हैं। एक नवयुवक, जिसने न जीवन का संघर्ष देखा है, न विषय-विकारों का प्रलोभन, उसके लिए ऐसे उपाधियाँ स्वाभाविक नहीं कही जा सकतीं।
ब्रह्मचर्य का विस्तृत स्वरूप
उपनिषदों में अनेक स्थलों पर ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल छात्राश्रम तक सीमित न रहकर संपूर्ण जीवनवृत्त के अनुशासन तक विस्तारित किया गया है।
बृहदारण्यक उपनिषद में कहा गया है कि ब्राह्मण वेदाध्ययन, यज्ञ, दान, उपवास, तप आदि द्वारा ब्रह्म को जानने का प्रयत्न करते हैं; और ब्रह्म-लोक की कामना हेतु गृहत्याग कर संन्यास का आश्रय लेते हैं। पुत्र, धन तथा स्वर्ग—इन तीनों की इच्छा का परित्याग कर वे परमहंस व्रत में प्रव्रज्या धारण करते हैं। यह स्पष्ट है कि चतुर्वर्णित आश्रम—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास—सभी ब्रह्मसाक्षात्कार की मार्ग-योजना का अंग हैं।
छान्दोग्य में त्रिविध धर्म बताए गए—यज्ञ, अध्ययन और दान (गृहस्थाश्रम), फिर तप (वानप्रस्थ), और अंत में निष्ठावान् ब्रह्मचर्य (नैष्ठिक या जीवनभर का ब्रह्मचारी)। इन सबका फल पुण्यलोक है, परन्तु केवल ब्रह्मसंस्थ संन्यासी अमरत्व को प्राप्त होता है।
इसी प्रकार अन्य उपनिषदों में—उद्गीथ, मौन-व्रत, वन-निवास, व्रत-नियम, यज्ञ—सभी को अंततः ब्रह्मचर्य के विस्तारित स्वरूप में स्वीकार किया गया है।
तप, संयम और त्याग का महत्त्व
केवल अध्ययन ही नहीं, तप, श्रम और संयम भी ब्रह्मज्ञान के लिए अनिवार्य घोषित हैं।
- कठोपनिषद में समस्त वेद, तप और ब्रह्मचर्य को ओंकार-प्राप्ति का साधन कहा गया है।
- मुण्डक में आश्रम-धर्म को तप, श्रद्धा, सत्य और ब्रह्मचर्य के रूप में प्रतिपादित किया गया।
- प्रश्न उपनिषद में तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा को ज्ञान की आधारभूमि माना गया।
सभी उपनिषद एक स्वर से कहते हैं कि जीवन के सभी चरणों में तप ही वह मूल है जो भवबन्धन से मुक्त करता है।
बृहदारण्यक में याज्ञवल्क्य वनगमन कर तपस्या करते हैं। छान्दोग्य में उपकोशल तप से थककर भोजन तक न कर सके। तैत्तिरीय में तप और वेदाध्ययन को एक ही माना गया है।
किन्तु तप एकमात्र साधन नहीं—नैतिक पात्रता और गुरु-कृपा के अभाव में, राजा बृहद्रथ के समान, दीर्घकालीन तप अनभिज्ञता में ही समाप्त हो सकता है।
उदाहरण—ब्रह्मविद्या का शिक्षण केवल युवावस्था तक सीमित न था
उपनिषदों का उपदेश प्रायः प्रथम जीवनावस्था में ही न समाप्त होता था—इसके प्रत्यक्ष उदाहरण भी उपलब्ध हैं।
श्वेतकेतु आरुणि जब अपने पिता गौतम को यह बतलाते हैं कि राजा प्रवाहण जैवलि द्वारा पूछे गए प्रश्नों का समाधान वे नहीं दे सके, तब गौतम स्वयं स्वीकार करते हैं—
“वत्स! तू जानता है कि जितना मेरा ज्ञान था, मैंने तुझे बताया। पर अब हम दोनों वहीं चलेंगे और पुनः शिष्य बनकर निवास करेंगे।”
फिर गौतम स्वयं राजा के पास जाकर कहते हैं—
“मैं आपका शिष्य बनकर शिक्षा चाहता हूँ।”
यह स्पष्ट करता है कि ज्ञान-प्राप्ति केवल बाल्यावस्था की सीमा तक बंधी न थी।
इसी प्रकार छान्दोग्य में जब श्वेतकेतु बारह वर्ष की शिक्षा समाप्त कर घर लौटते हैं, और तत्पश्चात् अपने पिता के मूल प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ होते हैं—
कि क्या उन्होंने वह शिक्षा प्राप्त की है जिसके द्वारा अनश्रुत, अचिन्तित और अविज्ञात वस्तु भी ज्ञात हो सकती है—
तो पिता स्वयं पुनः उन्हें उच्चतर ज्ञान देने का कार्य गृहस्थ जीवन में ही आरम्भ करते हैं।
आचार्यों और अनुभवी गृहस्थों में ज्ञान-गमनागमन
बृहदारण्यक में याज्ञवल्क्य मaitreyi, जनक, गार्गी तथा आर्तभाग को उपदेश देते हैं—जो सभी प्रौढ़, अनुभवी और शिक्षा के आकांक्षी हैं।
छान्दोग्य में पाँच विख्यात गृहस्थ—
प्राचीनशाल, सत्ययज्ञ, इन्द्रद्युम्न, जन शार्कराक्ष्य, और बुडिल अश्वतराश्वि—
प्रथम उद्दालक से, फिर अश्वपति कैकेय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने जाते हैं।
मुण्डक में महाशाल गृहस्थ सौनक—अंगिरस से ज्ञान प्राप्त करने आते हैं।
नारद ने विविध विद्याओं का अध्ययन प्रथम ही कर लिया था, परंतु आत्मविद्या के अभाव को स्वीकार कर शनतकुमार के शिष्य बनते हैं—
“भगवन्! मैंने समस्त मन्त्र सीख लिये, परन्तु आत्मा का ज्ञान अभी तक न प्राप्त हुआ।”
इन्द्र का भी गृहस्थ आयु में ही शिष्यत्व ग्रहण कर वृद्धावस्था तक अध्ययन करना उल्लिखित है।
गृहस्थ के लिए भी पुनः गुरुकुल-गमन की मान्यता
आपस्तम्ब का मत है कि जो पुरुष गुरुकुल से लौट आये हों, यदि वे अपने ज्ञान की वृद्धि चाहते हों, तो प्रतिवर्ष दो मास पुनः आचार्य के समीप रह सकते हैं—
यद्यपि सामान्य गृहस्थ-धर्म के कारण यह सर्वथा अनिवार्य नहीं था।
किन्तु विशेष विषय सिद्धि के लिए यह मार्ग स्वीकृत था।
विद्यार्थी के लिए गुरुवर का विदाई-उपदेश
विद्यार्थित्व की समाप्ति पर आचार्य द्वारा जो मौलिक उपदेश दिया जाता था, वह निम्न प्रकार था—
- सत्य का पालन करो।
- धर्म का आचरण करो।
- वेद-अध्ययन का त्याग न करो।
- गुरुदक्षिणा अर्पित कर गृहस्थ-धर्म का निर्वाह करो।
- सत्य-धर्म से विचलित न होओ।
- आरोग्य की उपेक्षा न करो।
- धन और लोक-कल्याण की उपेक्षा न करो।
- वेद का अध्ययन और अध्यापन दोनों करो।
तत्पश्चात—
- माता, पिता, आचार्य और अतिथि–इन्हें देवतुल्य समझो।
- जो कर्म निष्कलंक हों, उन्हीं का अनुगमन करो।
- दान श्रद्धा सहित दो—हर्ष, लज्जा, भय और कर्तव्य-बोध सहित।
- यदि किसी आचरण या धर्म में संशय उत्पन्न हो—
तो प्रज्ञावान ब्राह्मण जिस प्रकार आचरण करें, उसी प्रकार तुम भी व्यवहार करो।
अन्ततः—
“यह मेरा उपदेश है, यह वेद का सार है, यह आदेश है—इसी का पालन करो।”
निष्कर्ष
इन उपदेशों से स्पष्ट है—
- विद्यार्थी-जीवन को केवल शिक्षा की पूर्णता नहीं,
- वरन् आगे के आश्रम—गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास—
में ब्रह्मविद्या की खोज का पूर्वाधार माना गया।
गुरु का वाक्य एक प्रकार से प्राचीन “उपाधि-समारोह” का भाषण था—
जिसमें धर्म, ज्ञान, संस्कार, समाज और स्वास्थ्य—सभी का समन्वित मार्गदर्शन निहित था।
अग्नि-संस्कार, यज्ञ, अतिथि-सत्कार और सामाजिक कर्तव्य
अग्नियों का प्रतिष्ठापन, यज्ञ-याग, अतिथियों का सम्मान, सामाजिक कर्तव्य, विवाह, पितृत्व तथा पितामह-पद—all ये गृहस्थ-धर्म के आवश्यक अंग माने गए। यहाँ यह भी सूचित होता है कि गुरु अपने शिष्य को यह शिक्षा देता समय विनम्र रहता था—वह उसके सद्गुणों का अनुकरण करने को कहता और अपने दोषों की अनदेखी करने का उपदेश करता। वह अपने से श्रेष्ठजनों की स्वीकृति भी करता था—यह उसकी विनयशीलता का प्रमाण है।
गुरु-शिष्य सम्बन्ध
गुरु और शिष्य के बीच संबंध अत्यन्त स्नेहपूर्ण तथा पितृतुल्य माने गए। शिष्य अपने आचार्य को पिता-तुल्य समझता था (प्रश्नोपनिषद् 6.8)। प्रतिदिन के अध्ययन के पूर्व उच्चारित होने वाला मंत्र “सहनाववतु” इस परस्पर-संकल्प का प्रतीक है—कि गुरु और शिष्य दोनों विद्याधारण एवं प्रसार में एक भाव से संलग्न रहें।
अनेक अवसरों पर आचार्य-गृह में रहने वाले शिष्य (अन्तेवासी) वहीं का जीवन इतना सुखद अनुभव करते कि वे वहीं जीवनपर्यन्त रहना चाहते थे, और उन्हें ऐसा करने की अनुमति भी थी (छान्दोग्य 2.23.2)।
गुरु-धर्म
गुरु का कर्तव्य था कि वह उच्चतम नैतिक एवं आध्यात्मिक योग्यताओं से युक्त हो। कठोपनिषद् (1.2.8) कहती है—“यह सत्य किसी हीन-गुण वाले द्वारा सिखाए जाने पर समझ में नहीं आता।”
मुण्डकोपनिषद् (1.2.12) गुरु की दो विशेषताएँ बताती है—
- श्रौत्रियः — शास्त्रों में निपुण
- ब्रह्मनिष्ठः — ब्रह्म-तत्त्व में स्थित
गुरु स्वयं जिस सत्य का साक्षात्कार कर चुका हो, वही वह शिष्य को बताने के लिए बाध्य था (मुण्डक)। किसी सत्य को छिपाना अपराध माना गया (प्रश्न 6.1)। तैत्तिरीय आरण्यक में आचार्य की यह भी आज्ञा है कि वह पूरे मन-प्राण से शिक्षण दे।
शतपथ ब्राह्मण यह कहता है कि जो शिष्य एक वर्ष तक गुरु-गृह में रहे, उसे गुरु को सभी उपदेशों का पूर्ण उद्घाटन करना चाहिए—यद्यपि यह भी गुरु का अधिकार था कि वह शिष्य की पात्रता के अनुसार ही ज्ञान दे।
कई गूढ़ विद्याएँ केवल योग्य व्यक्तियों के लिए आरक्षित थीं—जैसे प्रावाहण जैवली का ब्रह्म-ज्ञान।
गुरु परिवर्तन (Teacher Change)
यदि गुरु को यह लगता कि किसी विषय के शिक्षण में कोई अन्य उससे श्रेष्ठ है, तो वह स्वयं अपने शिष्य को उस श्रेष्ठ आचार्य के पास भेज देता। गोपथ-ब्राह्मण में ऐसा एक उदाहरण मिलता है—मौद्गल्य और मैत्रेय की चर्चा के उपरांत मैत्रेय अपने को विषय-ज्ञान में कमजोर पाकर तत्काल कक्षा भंग कर देता है, और पुनः अध्ययन करता है।
शिष्यों की इच्छा और गुरु-परम्परा
यद्यपि गुरु सत्य-निष्ठ थे, किन्तु वे अधिकाधिक योग्य शिष्यों की प्राप्ति की कामना भी रखते थे—इसलिए कि उनके द्वारा प्राप्त दिव्य-ज्ञान की परम्परा जीवित रहे। यही गुरु-परम्परा (गुरु-परंपरा) संस्कृति की निरन्तरता का आधार थी।
तैत्तिरीय आरण्यक (7.4) में यह प्रार्थना आती है—
“जैसे जल नीचे की ओर बहता है और माह वर्ष में विलीन होते हैं, उसी प्रकार हे देव! सब दिशा से ब्रह्मचारिणी मेरे पास आएँ।”
श्रेष्ठ आचार्य स्वयं छात्रों द्वारा खोजे जाते थे—कई बार दूर-दूर प्रदेशों से। पटनचल काप्य के पास ऐसे विद्यार्थी आए जो मद्र देश तक भ्रमण कर यज्ञ-विधि सीखने पहुँचे।
वैदिक शिक्षा किसके लिए खुली थी?
गृह्यसूत्रों से ज्ञात होता है कि तीनों द्विज जातियों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—को ब्रह्मचर्य-शिक्षा अनिवार्य थी। यह आर्य समाज में एक प्रकार की सार्वभौमिक शिक्षा-व्यवस्था थी।
अथर्ववेद (15.5.17) में राजाओं के ब्रह्मचर्य-पालन का उल्लेख आता है। कठक संहिता (9.16) भी सिद्ध करती है कि केवल ब्राह्मण ही नहीं, अन्य जातियों के लोग भी विद्याध्ययन करते थे।
उपनिषदों और ब्राह्मण ग्रंथों में अनेक क्षत्रियों के विद्वान होने के उदाहरण मिलते हैं—जो वेदों और ब्रह्मविद्या में प्रवीण हुए।
क्षत्रियों का अध्यापन एवं विद्यानुराग
शतपथ ब्राह्मण (XI.6.2.1) में वर्णित है कि विदेह-नरेश जनक की भेंट तीन भ्रमणशील ब्राह्मणों—श्वेतकेतु अरुणेय, सोमशुष्मा सात्ययज्ञि तथा याज्ञवल्क्य—से हुई। जनक ने उनसे अग्निहोत्र की विधि के विषय में प्रश्न किया। तीनों ने उत्तर दिया; परन्तु याज्ञवल्क्य के उत्तर में कुछ अपूर्णताओं का संकेत करते हुए राजा ने कहा— “हे याज्ञवल्क्य, तुमने अग्निहोत्र-तत्त्व का अधिकांशतः आकलन कर लिया।”
तत्पश्चात ब्राह्मणों ने आपस में कहा— “यह राजन्य तो वाणी में हमसे बढ़कर है; आओ, इसे ब्रह्मवाद-विचार में आमंत्रित करें।” किंतु याज्ञवल्क्य ने सावधान किया—
“हम ब्राह्मण हैं और वह राजन्य; यदि हम उसे परास्त करें तो इसका क्या गौरव? और यदि वह हमें परास्त करे, तो जन-जन कहेंगे कि एक क्षत्रिय ने ब्राह्मणों को पराजित किया।”
अन्ततः अग्निहोत्र-तत्त्व का वास्तविक निरूपण जनक ने ही किया। तब याज्ञवल्क्य ने उन्हें वर माँगने का अवसर दिया और जनक ने कहा—
“हे याज्ञवल्क्य! मेरा वर यह हो कि जब इच्छा हो, तब मैं तुमसे प्रश्न पूछ सकूँ।”
और इसी प्रकार जनक ब्रह्मिष्ट—अर्थात दिव्य-ज्ञान से युक्त—माने गए।
विद्वान क्षत्रियों के उदाहरण
जनक अकेले नहीं थे। उपनिषदों में ऐसे कई क्षत्रिय प्रख्यात हैं जिन्होंने ब्राह्मणों को मौन कराया—
- कौषीतकि में बालाकि गार्ग्य को काशी-नरेश अजातशत्रु ने ज्ञान-प्रदर्शन द्वारा चुप करा दिया।
तब गार्ग्य ने समिधा हाथ में लेकर कहा— “मुझे शिष्य की भाँति स्वीकार करो।”
राजा ने कहा—
“यह विपरीत है कि क्षत्रिय ब्राह्मण को उपनयन दे; फिर भी, आओ, मैं तुम्हें शिक्षा दूँ।”
- इसी प्रकार प्रवाहण जैवली, पंचाल-नरेश ने श्वेतकेतु और उनके पिता उद्दालक दोनों को मौन कर अपने शिष्यों की भाँति शिक्षा दी।
- अश्वपति कैकेय के पास पाँच विद्वान ब्राह्मण समिधा लेकर पहुँचे — उन्होंने उनसे वैश्वानर-विद्या का उपदेश माँगा।
- देवताओं में भी — सनत्कुमार, जो युद्ध-देव माने गए — ने नारद को आत्मविद्या प्रदान की।
क्षत्रियों के विद्यानुराग पर मतभेद
आधुनिक विद्वानों—मैकडॉनल व कीथ—का मत है कि इन घटनाओं से यह सिद्ध नहीं होता कि क्षत्रिय सामान्य रूप से विद्या-अध्ययन में प्रवृत्त थे। वे कहते हैं—
- ये उदाहरण कुछ चुनिंदा राजाओं के हैं
- अधिकांश क्षत्रियों का मुख्य कार्य शासन और युद्ध था
- विद्या के प्रति रुचि अधिकतर ब्राह्मणों की थी
- राजा कभी-कभी विद्वानों की सभा मनोरंजन-रूप से सुनते होंगे
- राजन्-ऋषि के उल्लेख तो हैं, परंतु ये अपवाद हैं
वे यह भी संकेत करते हैं कि राजा को विद्वान बताना कभी-कभी प्रशंसा और काव्य-अलंकार की दृष्टि से होता था।
फिर भी—
शतपथ के प्रसंग में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि अंत में जनक स्वयं याज्ञवल्क्य को गुरु-स्वरूप मान सम्मान देते हैं। और वर भी माँगते हैं—
“मुझे यह अधिकार मिले कि जब चाहूँ, तुमसे प्रश्न कर सकूँ।”
अतः राजा, विद्या में अग्रणी होने पर भी, ब्राह्मण को गुरु-रूप में आदर देते थे।
साहित्य
स्वाध्याय—वेदाध्ययन—इस काल का मुख्य लक्ष्य था।
इसका महत्व शतपथ व तैत्तिरीय आरण्यक में अत्यन्त उन्नत रूप में वर्णित है।