सरलता क्या है ?
परमात्मा केवल सरल व्यक्ति को ही प्राप्त होता है। प्रश्न उठता है कि सरलता व्यवहार की होनी चाहिए या भीतर की। सरल का अर्थ है सीधी अवस्था, जैसे सीधी लकड़ी, और जटिल का अर्थ है उलझी, टेढ़ी-मेढ़ी और गांठों से भरी अवस्था। यह सरलता शरीर की नहीं, बल्कि बुद्धि की है। सत्य बोलना सरल है […]
स्वाध्याय क्यों आवश्यक है
क्रियायोग के अंतर्गत तीन प्रमुख अंग बताए गए हैं: तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रसाद। क्रियायोग का उद्देश्य समाधि भाव उत्पन्न करना और आंतरिक क्लेशों का तनुकरण करना है। क्लेश वे हैं जो चित्त को अशांत करते हैं, जैसे उल्टा-सीधा विचार और मानसिक अस्थिरता।तप से शारीरिक और बाह्य क्लेश, स्वाध्याय से मानसिक और बौद्धिक क्लेश, और ईश्वर-प्रसाद […]
राजा कैसा हो ?
वर्तमान समय में मनुस्मृति की आलोचना की जाती है, किंतु महर्षि मनु ने राजव्यवस्था में ऊंचे आदर्श प्रस्तुत किए हैं राजा की आवश्यकता और राजा कैसा होना चाहिए, यह वैदिक सिद्धांतों के अनुसार स्पष्ट किया गया है राजा की दैवीय उत्पत्ति का सिद्धांत महर्षि मनु ने प्रतिपादित किया और यह सिद्धांत आधुनिक लोकतंत्र से पहले […]
ब्रह्मचर्य का रहस्य ?
कर्मचारी कौन है, इसकी उम्र क्या हो सकती है, ब्रह्मचारी कौन है और क्या उसकी आयु से संबंध है, यह प्रश्न उठाए गए हैं ब्रह्मचर्य का अर्थ समझना जरूरी है, ब्रह्मचर्य ब्रह्म और चर्य से बना है, इसका पालन करने वाला ब्रह्मचारी कहलाता है ब्रह्मचर्य का पालन तीन स्तरों पर होता है, शारीरिक, मानसिक और […]
क्या है तपस्या , परिश्रम ?
योगसूत्र में कहा गया है कि बिना तपस्या के योग की सिद्धि नहीं होती। उसी तरह गुरुकुल के ब्रह्मचारी के लिए भी तप आवश्यक है, क्योंकि तप के बिना ब्रह्मचर्य की सिद्धि असंभव है। तप का अर्थ है द्वंद्वों को सहना—जैसे ठंड, गर्मी, नींद, आलस्य या असुविधाओं को सहकर भी अपनी दिनचर्या का पालन करना। […]
कौनसी शिक्षा महत्वपूर्ण ? गुरुकुल या कॉलेज
यहाँ पर मुख्य बातें तीन स्तरों पर कही जा सकती हैं। सबसे पहले सामाजिक और पारिवारिक स्थिति पर। आजकल एक विचार फैल रहा है कि “मैं ऐसा ही हूँ, मुझे मत बदलो”। यह वाक्य वास्तव में ज्ञानियों का नहीं बल्कि कुंठित और असंतुष्ट व्यक्तियों का होता है। यह भोगवाद और उपभोक्तावाद से उपजा है, जहाँ […]
यदि जीवन मे गुरु नहीं तो ?
हर व्यक्ति अपने विषय में कुछ जानता है कि मैं कौन हूँ और कैसा हूँ, अपने गुणों और अवगुणों की जानकारी भी उसे होती है, फिर भी गुरु की आवश्यकता इसलिए होती है क्योंकि गुरु उसके गुणों की वृद्धि करता है और अवगुणों को दूर करता है। गुरु के बिना व्यक्ति अहंकारी हो जाता है […]
प्राचीन गुरुकुल बनाम vs आधुनिक स्कूल
गुरुकुल व्यवस्था मानव को महामानव बनाने की प्रयोगशाला कही जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य परंपरा का रक्षण और संस्कृति का संरक्षण करना है। कुछ गुरुकुल विशेष संप्रदायों जैसे अद्वैत वेदांत में शास्त्र अध्यापन कराते थे। आधुनिक विद्यालयों में जहाँ बच्चों को अधिक सुविधाएँ और समय मिलता है, वहीं गुरुकुल में शिक्षा का लक्ष्य केवल नौकरी […]
मित्रता क्या है
दोस्ती का अर्थ समझना जरूरी है क्योंकि मित्र वह होता है जो आपके भावों को समझे और जिसके साथ आप मन की बातें साझा कर सकें। सच्चे मित्र पर विश्वास और सहयोग का भाव होता है, जबकि एकतरफा मित्रता असंतुलन पैदा करती है। असली मित्र वह है जो संकट में साथ दे और आपके लिए […]
आचार्य की परिभाषा और महत्व
आचार्य-शिष्य संबंध के कई स्तर होते हैं। गुरु पक्षपाती नहीं होता और सबको समान रूप से मार्गदर्शन देता है। अगले स्तर पर वह कुछ विशेष शिष्यों को कार्य सौंपकर उनकी आज्ञापालन और अनुशासन की परीक्षा लेता है। जो विपरीत कार्य करता है, उसकी उपेक्षा की जाती है। त्रुटियाँ होना स्वाभाविक है क्योंकि हम पूर्ण नहीं […]