Description
भूमिका
विगत अनेक वर्षों से देश-विदेश में ध्यान को प्रायोगिक रूप से सिखाने का अवसर मिला है। साथ ही अनेक विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं व साधकों से परिचर्चा व ध्यान सम्बन्धित अनेकानेक पुस्तकों का अध्ययन-अध्यापन भी करा-कराया है। प्रायः प्रत्येक धार्मिक व आध्यात्मिक सम्प्रदाय में किसी न किसी रूप में ध्यान प्रचलित है। किन्तु नवीन जिज्ञासु को किन्हीं दो पुस्तकों या सम्प्रदायों की ध्यान विधि में एकरूपता नहीं मिलती । परन्तु ध्यान व उसके लाभ तो मानव मात्र के लिए उपकारी हैं।
इसलिए यह पुस्तिका ध्यान को सर्वग्राह्य बनाने और मेरे अनुभव के आधार पर जनसामान्य को ध्यान की ओर प्रेरित करने की दिशा में में एक प्रयास है। यह उन लोगों के लिए भी है जो आध्यात्मिक श्रद्धा नहीं रखते हैं।
इस पुस्तिका में सम्प्रदाय आग्रह रहित योगसूत्रों व वैज्ञानिक निष्कर्षों का ही विषय प्रतिपादन के लिए प्रयोग किया गया है। इसमें आर्ष ग्रन्थों यथा योग-सूत्रों, गीता, उपनिषद् और तार्किक चिन्तन के मेल से प्रथम बार ध्यान की विषय वस्तु को चार स्तरों में विभाजित किया गया है।
प्रथम स्तर के ध्यान का उद्देश्य मात्र बाह्य प्रसन्नता व शान्ति है। इसी स्तर पर प्रायः अधिकांश मनुष्य होते हैं, और इस स्तर पर किसी आध्यात्मिक आग्रह की आवश्यकता भी नहीं होती है। इसलिए पतञ्जलि प्रोक्त ‘चित्त प्रसादत्त’ शीर्षक का ध्यान के प्रथम स्तर के लिए अभिनव प्रयोग किया गया है एवं विस्तार से व्याख्या की गई है। अग्रिम उच्च स्तर गम्भीर व प्रायोगिक अधिक होने से उनकी विशेष व्याख्या नहीं दी गई है, सामान्य परिचय मात्र दिया गया है। ध्यान के १०८ लाभों की चर्चा अतिश्योक्तिपूर्ण न होकर सुन्दर व व्यवस्थित प्रस्तुतिकरण है।
कृतज्ञताः परमात्मा की अनुकम्पा से जिन गुरुजनों ने मुझे ध्यान की विविध विधियों में दीक्षित किया कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं। जिन ऋषि मुनि व विद्वानों के ग्रन्थों को अनेक बार पढ़कर चिन्तन मनन कर निष्कर्षों पर पहुंचा, उनका सदैव ऋणी हूं। एवं अपने सभी मित्रों व विद्यार्थियों का जिन्होंने इन विधियों को सीखकर, चर्चा कर मुझे अनेक सकारात्मक प्रतिफल दिये उनके मंगल की सदैव कामना करता हूं। आशा है अब नित्य परिवर्तनशील संसार सरण करता हुआ जीवन संजीवन ध्यान की शरण में पहुंचेगा और मानव जाति अपने वास्तविक विकास को संदर्थों में परिभाषित कर पाएगी और हमारे यह कार्य उसमें कहीं न कहीं निमित्त बनेंगे ।
– प्रशान्त
ध्यान क्यों करना चाहिए?
ध्यान क्या होता है और कैसे किया जाता है, इस विषय पर विस्तार से जानने से पहले ध्यान से होने वाले लाभों को जानना (आवश्यक) है, जिससे ध्यान में रुचि और आकर्षण उत्पन्न हो सके। आज जनसामान्य की योगासनों और प्राणायाम में रुचि उत्पन्न हो चुकी है। जो योगासन और प्राणायाम नियमित नहीं भी करते, वे भी इनसे होने वाले लाभ से प्रायः अवगत तो हैं ही। किंतु योग का मुख्य लक्ष्य ध्यान-समाधि है। योगासन व प्राणायाम तो इसके सहयोगी साधन हैं। जब साधन से इतना लाभ है तो साध्य से कितना होगा? इसलिए, आइए ध्यान की ओर चलें।
अति प्राचीन काल से ही ध्यान का अभ्यास भारत भूमि पर प्रचलित है। ध्यान का वर्णन वेद संहिताओं, दर्शन-उपनिषदों, रामायण, महाभारत, गीता इत्यादि अनेक ग्रंथों में उपलब्ध होता है। प्राचीन भारत में वैदिक ऋषियों ने जितना भी ज्ञान-विज्ञान प्राप्त किया था, वह सब ध्यान-समाधि के माध्यम से ही प्राप्त किया था। ध्यान से प्राप्त अपूर्व एकाग्रता और विलक्षण मेधा के बल से ऋषियों ने बिना विशेष संसाधनों के आयुर्वेद, शिल्पशास्त्र, व्याकरण, काव्यशास्त्र, ज्योतिष इत्यादि असंख्य भौतिक विद्याओं के क्षितिज पर आकाश में रमण किया है। अध्यात्म में ध्यानगत अनुभूतियों के कारण ही भारत विश्व गुरु कहलाया है।
जितनी भी महान विभूतियाँ भारत भूमि पर अवतरित हुईं, उनके दर्शन में न केवल ध्यान की प्रधानता रही, बल्कि वे स्वयं ध्यान के बड़े अभ्यासी थे। ध्यान उनके जीवन का अंग था। चाहे बुद्ध हों या महावीर, आचार्य शंकर हों या रामानुज, मीरा, संत कबीर, गुरु नानक देव, महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद या श्री अरविंद— सभी ने ध्यान की महिमा का गान किया है। संसार के अन्य सभी महापुरुषों और महान प्रतिभाओं ने भी किसी न किसी रूप में ध्यान का सहारा लिया है। उन्होंने प्रत्यक्ष आसन नहीं लगाया तो भी वे बड़े एकांत-चिंतक रहे। गहन मौन और सन्नाटे से ही उनके उच्च विचार प्रकट हुए और उनकी क्षमताओं का पूर्ण विकास और विस्तार संभव हुआ।




Reviews
There are no reviews yet.